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शनिवार, 25 अगस्त 2012

प्रेमचंद घर में (Premchand ghar mein by Shivrani Devi Premchand)



    उन दिनों मैं अकेली महोबे में रहती थी. वे जब दौरे पर रहते तो मेरे साथ ही सारा समय काटते और अपनी रचनाएँ सुनाते. अंग्रेजी अखबार पढ़ते तो उसका अनुवाद मुझे सुनाते. उनकी कहानियों  को सुनते-सुनते मेरी भी रुचि साहित्य की ओर हुई. जब वे घर पर होते, तब मैं कुछ पढ़ने के लिए उनसे आग्रह करती. सुबह का समय लिखने के लिए वे नियत रखते. दौरे पर भी वे सुबह ही लिखते. बाद को मुआइना करने जाते. इसी तरह मुझे उनके साहित्यिक जीवन के साथ सहयोग करने का अवसर मिलता. जब वे दौरे पर होते, तब मैं दिन भर किताबें पढ़ती रहती. इस तरह साहित्य में मेरा प्रवेश हुआ.
    उनके घर रहने पर मुझे पढ़ने की आवश्यकता न प्रतीत होती. मुझे भी इच्छा होती कि मैं कहानी लिखूँ. हालाँकि मेरा ज्ञान नाममात्र को भी न था, पर मैं इसी कोशिश में रहती कि किसी तरह मैं कोई कहानी लिखूँ. उनकी तरह तो क्या लिखती. मैं लिख-लिखकर फाड़ देती. और उन्हें दिखाती भी नहीं थी. हाँ, जब उनपर कोई आलोचना निकलती तो मुझे उसे सुनाते. उनकी अच्छी आलोचना प्रिय लगती. काफी देर तक यह खुशी रहती. मुझे यह जानकार गर्व होता कि मेरे पति पर यह आलोचना निकली है. जब कभी उनकी कोई कड़ी आलोचना निकलती, तब भी वे उसे बड़े चाव से पढ़ते. मुझे तो बहुत बुरा लगता.
    मैं इसी तरह कहानियाँ लिखती और फाड़कर फेंक देती. बाद में गृहस्थी में पड़कर कुछ दिनों के लिए मेरा लिखना छूट गया. हाँ, कभी कोई भाव मन में आता तो उनसे कहती, इस पर आप कोई कहानी लिख लें. वे जरूर उस पर कहानी लिखते.
    कई वर्षों के बाद, 1913 के लगभग, उन्होंने हिन्दी में कहानियाँ लिखना शुरू किया. किसी कहानी का अनुवाद हिन्दी में करते, किसी का उर्दू में. 
    मेरी पहली 'साहस' नाम की कहानी चाँद में छपी. मैंने वह कहानी उन्हें नहीं दिखाई. चाँद में आपने देखा. ऊपर आकर मुझसे बोले - अच्छा, अब आप भी कहानी-लेखिका बन गईं ? बोले - यह कहानी आफिस में मैंने देखी. आफिसवाले पढ़-पढ़कर खूब हँसते रहे. कइयों ने मुझ पर संदेह किया. 
    तब से जो कुछ मैं लिखती, उन्हें दिखा देती. हाँ, यह खयाल मुझे जरूर रहता कि कहीं मेरी कहानी उनके अनुकरण पर तो नहीं जा रही हो. क्योंकि मैं लोकापवाद को डरती थी.
    एक बार गोरखपुर में डा. एनी बेसेंट की लिखी हुई एक किताब आप लाए. मैंने वह किताब पढ़ने के लिए माँगी. आप बोले - तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं बोली - क्यों नहीं आएगी ? मुझे दीजिए तो सही. उसे मैं छः महीने तक पढ़ती रही. रामायण की तरह उसका पाठ करती रही. उसके एक-एक शब्द को मुझे ध्यान में चढ़ा लेना था. क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं उस किताब को खतम कर चुकी तो उनके हाथ में देते हुए बोली - अच्छा, आप इसके बारे में मुझसे पूछिए. मैं इसे पूरा पढ़ गई. आप हँसते हुए बोले - अच्छा !
    मैं बोली - आपको बहुत काम रहते भी तो हैं. फिर बेकार आदमी जिस किसी चीज के पीछे पड़ेगा, वही पूरा कर देगा. 
    मेरी कहानियों का अनुवाद अगर किसी और भाषा में होता तो आपको बड़ी प्रसन्नता होती. हाँ, उस समय हम दोनों को बुरा लगता, जब दोनों से कहानियाँ माँगी जातीं. या जब कभी रात को प्लाट ढूँढ़ने के कारण मुझे नींद न आती, तब वे कहते - तुमने क्या अपने लिए एक बला मोल ले ली. आराम से रहती थीं, अब फिजूल की एक झंझट खरीद ली. मैं कहती - आपने नहीं बला मोल ले ली ! मैं तो कभी-कभी लिखती हूँ. आपने तो अपना पेशा बना रखा है.
    आप बोलते - तो उसकी नकल तुम क्यों करने लगीं ?
    मैं कहती - हमारी इच्छा ! मैं भी मजबूर हूँ. आदमी अपने भावों को कहाँ रखे ?
    किस्मत का खेल कभी नहीं जाना जा सकता. बात यह है कि वे होते तो आज और बात होती. लिखना-पढ़ना तो उनका काम ही था. मैं यह लिख नहीं रही हूँ, बल्कि शांति पाने का एक बहाना ढूँढ़ रखा है. 


लेखिका - शिवरानी देवी
किताब - प्रेमचंद घर में 
प्रकाशक - रोशनाई प्रकाशन, पश्चिम बंगाल, 2005

इस किताब में प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने अपने घरेलू जीवन के छोटे-छोटे संस्मरण दर्ज किए हैं. यह पहली बार 1944 में छपी थी और सका दूसरा संस्करण हिन्दुस्तानी पब्लिशिंग हाउस, इलाहाबाद से 1952 में. दूसरे संस्करण को तैयार करते समय शिवरानी देवी ने अपने नाती प्रबोध कुमार की मदद से किताब में कुछ चीजें जोड़ी-घटाई थीं. पता नहीं उन्हें शामिल किया गया था या नहीं, लेकिन उसी संस्करण के आधार पर रोशनाई प्रकाशन की पांडुलिपि बनी थी. मेरा खयाल है कि प्रस्तुत प्रसंग से वास्तविक जीवन की परतों को समझा जा सकता है. 

1 टिप्पणी:

  1. 'प्रेमचंद घर में' (शिवरानी देवी) पढ़ना अपने आप में अनूठी बात है कालजयी लेखकों को कितनी ही दफा पढ़ें मन ऊर्जा से ही बढ़ता है

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