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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

प्रमाणपत्र (Pramanpatra by Purwa Bharadwaj)


पिछले दिनों परीक्षा और प्रमाणपत्र पर कुछ खोज रही थी मैं। उस दौरान तेत्सुको कुरोयानागी की 'तोत्तो चान'  किताब पलटी और आशा के अनुरूप बहुत दिलचस्प प्रसंग सामने आया। उसमें तोत्तो चान अपने स्कूल से मिलनेवाले पहले प्रगति-पत्र को अपने कुत्ते रॉकी को दिखाती है। उस खुले कागज़ को वह सूँघता है, अपनी गर्दन टेढ़ी करके फिर एक बार देखता है और तोत्तो चान का हाथ चाट लेता है। तोत्तो चान संतुष्ट हो जाती है। उस प्रगति-पत्र में कहीं 'ए' था तो कहीं 'बी' और ऐसे ही कुछ दूसरे चिह्न थे। तब तक तोत्तो चान को यह पता नहीं था कि 'ए' 'बी' से बेहतर होता है या 'बी' 'ए' से। 

काश सभी बच्चे तोत्तो चान की तरह प्रमाणपत्र के अबूझ चिह्नों से अनजान रहते ! मुझे अपनी बेटी का प्रमाणपत्र याद आ गया। मीराम्बिका से लेकर पंचशील प्ले स्कूल, बीच में सेंट ज़ेवियर्स और स्प्रिंगडेल्स स्कूल की दोनों शाखाओं - धौला कुँआ और पूसा रोड का प्रमाणपत्र। नृत्य की कक्षा के लिए दूसरे राज्य की नृत्य-संगीत संस्था से जारी प्रमाणपत्र भी। कितना कुछ था उनमें ! पूरा शिक्षणशास्त्र, पूरी Pedagogy उससे झलकती थी। मीराम्बिका में जब रिपोर्ट कार्ड की जगह दीदी (शिक्षिका) के हाथ से लिखा हुआ पत्र मिला था तब बहुत आश्वस्ति हुई थी। (यह अलग बात है कि वह बहुत क्षणिक आश्वस्ति निकली।) अफ़सोस कि धीरे-धीरे हम रिपोर्ट कार्ड वाले प्रमाणपत्र के आदी हो गए और मेरी बेटी बहुत जल्दी यह समझने लगी कि 'ए' 'बी' से बेहतर होता है या 'बी' 'ए' से।  

एक बार पटना में पुलिस को लेकर बच्चों का नाटक बनाया था सुमन ने। उस कार्यशाला की समाप्ति के बाद बच्चों को प्रमाणपत्र देना तय हुआ था। पुलिसिया रंगों और चिह्नों को लेकर अमिताभ पांडे ने (संभवतः, यहाँ शंका की वजह अपनी स्मृति पर से भरोसा उठना है) उसका प्रमाणपत्र डिज़ाइन किया था। उस पर बच्चों ने खुद अपना नाम लिखा था।  हाल में घर बदलने के दौरान जो दबा छुपा खजाना निकला उसमें मेरी बेटी का वह प्रमाणपत्र भी था। रुपहले चमकदार अक्षरों में उसने चिड़िया जैसा कुछ निशान बना रखा था। 

यह सबकुछ दिमाग में चक्कर काट ही रहा था कि मुझे झटका लगा। एक अनजान शहर के एक सज्जन का नए साल की शुभकामना का संदेश मिला। थोड़ी हैरानी हुई मुझे। अच्छा, उनकी तरफ से कैसे यह संदेश आया। मैंने एक बार जयधी (देवर-देवरानी की बेटी) की सड़क दुर्घटना में मौत के सिलसिले में उनसे संपर्क किया था। अपना फोन उठाकर देखा तो पाया कि मेरे व्हाट्सऐप पर नववर्ष संदेश के ठीक पहले उस बच्ची का मृत्यु प्रमाणपत्र है। उस प्रमाणपत्र में बच्ची का नाम गलत लिख दिया गया था जिसे सुधरवाने के आग्रह से मैंने उन डॉक्टर साहब को भेजा था। कितना अजीब है यह मृत्यु प्रमाणपत्र न ! और उसकी फोटो खींचकर उसे किसी को भेजना और उसके ठीक बाद शुभकामनाओं का आदान-प्रदान ! मैं रस्मी तौर पर भी जवाब नहीं दे पाई उस शुभकामना संदेश का।  मेरे दिमाग में वह मृत्यु प्रमाणपत्र अटका रह गया। 

उसके साथ ही यह सवाल परेशान करता रहा कि आखिर मौके मौके पर जो संदेश मित्रों और परिजनों को भेजे जाते हैं उनको हम कैसे लेते हैं। क्या थोक भाव में एक साथ सबको निपटा देते हैं ? क्या ईद मुबारक का संदेश मैं नहीं लिखूँ या GET WELL SOON नहीं भेजूँ तो दोस्ती या चिंता में कमी आ जाएगी ? प्यार का प्रदर्शन होना ज़रूरी है, उसको व्यक्त करना चाहिए, लेकिन थोक भाव से सबको एक अंदाज़ में कुछ कह कर निश्चिन्त हो जाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। सभ्यता का प्रमाणपत्र नहीं है यह। समय की कमी से अधिक इसका कारण मुझे भावना की कमी लगता है। 

या कहिए शब्दों का टोटा पड़ जाता है। हाँ, यह शायद ज़्यादा सही है। जब जन्मदिन या शादी की सालगिरह की सैंकड़ों बधाई हम कबूल करते हैं तो यह लगता है कि शुक्रिया, धन्यवाद, Thank you, Thanks वगैरह को दोहराने के अलावा चारा क्या है ! मेरी कोशिश रहती है कि जिससे जैसा संबंध है उसके मुताबिक लिख पाऊँ, भले ही संक्षिप्त हो। उस क्रम में हम सब अटकते हैं, उलझते हैं। आखिर नए माध्यमों ने हमारे सामने यह भी एक चुनौती पेश की है। हमारे शब्द हमारी भावनाओं और रिश्तों के प्रमाणपत्र माने जाते हैं तो सामनेवाले को उसका इंतज़ार रहता है। दिक्कत होती है जब कहे गए, लिखे गए, भेजे गए शब्दों का पोस्टमार्टम होने लगता है। 

प्रमाणपत्र किसी भी तरह का हो, उसको तोला-परखा जाता है। उसकी चीर-फाड़ होती है। वह नकली तो नहीं, Fake तो नहीं (यह जुमला मैंने अपनी बेटी से सीखा है जो आजकल अक्सर इसका इस्तेमाल करती है। उसे कभी किसी की हँसी Fake लगती है तो किसी का प्यार जतलाना Fake लगता है तो कभी कोई इंसान ही Fake लगने लगता है। मैं डरती भी हूँ उसके जुमले से कि किसी फैसले पर तुरत मत पहुँचो या Judgmental मत हो और दूसरों को खारिज मत करो। बहरहाल ) प्रमाणपत्र को ठोंक बजाकर देखने में गलत कुछ नहीं है। बस ध्यान में यह रखना चाहिए कि प्रमाणपत्र किसने किसको और कब दिया है। चाहे वह बच्चे को दिया गया प्रमाणपत्र हो या औरत के चरित्र पर दिया गया प्रमाणपत्र हो या सरकार की कामयाबी का प्रमाणपत्र हो। 




शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

सुनो मैं तुम्हें बुला रहा हूँ (Suno main tumko bula raha hoon by Malek Haddad)

मेरे अतिरिक्त इस छिन्न-भिन्न झाड़ी के गीत भी 
मेरी बात सुनो,
मैं एक लाश के मुख से बोलता हूँ 
मेरी बात सुनो,
मैं अपने हाथ से 
जो उसके गिटार पर टूट गया है लिखता हूँ 

मैं तुम्हारा दर्पण हूँ 
हत्यारा देखने में सुंदर है। 
और मेरे पास सही कुरूपता है इस सत्य की 
जिसे कहने पर चोट लगती है। 

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो हर बार निकलती है 
जब कवि अपने संगीत के 
और शब्दों के मर्म में डूब जाता है,
जहाँ तक मेरा सवाल है, शब्द जो मैं लिखता हूँ गणित है 
कि इतने अल्जीरियाइयों को मौत के घाट उतारा गया :

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो निकलती है हर बार। 
जब सजधज कर निकलता है तुषार 
प्रतीक्षा करता है 
अति विशुद्ध सिकन्दरियाई मवेशियों की। 
प्रेम की पहिचान के लिए 
मैं केवल टेलीफ़ोन 
और स्नानघर के बाल्टे को जानता हूँ 

'चोर को पकड़ो' एक चीख है 
जो निकलती है जब कविता लिखने चलता हूँ,
हम बहादुरी स्वांग को इतिहास बनाते हैं 
हम शब्द का मनुहार और प्रेम की भिक्षा माँगते हैं 
हम एक दर्पण में स्वयं को देखते हैं। 

झोपड़ी और हृदय ?
अल्जीरिया की ऊँचाई पर है 
'सेसनी विला'
मेरे प्रेम का क़िला। 

मेरे सारे सत्य एक स्वप्न हैं 
मुझे बताया गया है कि मासूमियत बच्चों की तरफ़दार होती है 
लेकिन मैंने 
ज़िंदा 
मरे 
और बचे हुओं को गिना है 
उन्हें भूलने में हमें हज़ारों वर्ष लगेंगे। 

मेरा संगीत 
जो अल्जीरिया की भूमि पर हर जगह सो रहे हैं 
उनकी नींद में व्याघात नहीं डालना चाहता 
सेना,मैं तुम्हें बुला रहा हूँ। 

इसे याद रखो 
जब मैं निर्वासन में अपनी लाश घसीटता था 
जब मेरी निगाहें बिना तुम्हारी निगाहों से मिले 
तुम्हें देखती थीं 
और यदि मैं जब अपनी चिट्ठियाँ खोलने से पहले अख़बार खोलता हूँ 
यदि मैं गुलाब की कोमलता को अब सराहता नहीं 
यदि मेरी फिर फिर यही टेक है 
कि वे कहीं दूर मेरी बात सुनते हैं 
यदि मेरा दिल मर गया है 
और तुम्हारा मेरे लिए गुनगुना रहा है जहाँ कहीं भी तुम हो 
इसे याद रखो :
मैं उनके साथ मर चुका हूँ। 



अल्जीरियाई कवि -  मलैक हद्दाद (5. 7. 1927 - 2. 6. 1978)
संकलन - धूप की लपेट 
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 


गुरुवार, 5 नवंबर 2015

इमली की खटास (Imalee ki khataas by Purwa Bharadwaj)

आज सुबह सुबह मुझे छोला बनाना था। सोचा कि प्याज़वाला छोला नहीं बनाऊँगी, बल्कि जिसे पंजाबी छोला कहा जाता है वह बनाऊँगी। मेरी बेटी को भी वही अधिक पसंद है। यह तय करते ही इमली की खोज शुरू हुई। इमली मिल ही नहीं रही थी। अमचूर मिला, नींबू भी घर में आ गया था। टमाटर था ही। लेकिन मुझे तो इमली की खटास चाहिए थी छोले में। मैं अपनी नई मददगार संगीता को समझाने लगी कि खटास खटास में अंतर होता है। वह पहाड़ी है और अभी तक उसकी भाव-भंगिमा को मैं पकड़ नहीं पाई हूँ। पहले तो उसे खटास शब्द ही नहीं समझ में आया। खट्टा कहने पर उसने समझा, मगर मेरी बेचैनी से वह एकदम निर्लिप्त थी। उसने दही का इस्तेमाल करने को सुझाया। मैंने सर हिला दिया। अंत में 'वेनेगर' यानी सिरके की शीशी की तरफ उसने इशारा किया कि इससे काम चला लो। अबकी मैं चिढ़ गई।

आखिर कैसे किसी को समझाऊँ कि मुझे इमली की खटास ही क्यों चाहिए ! बड़ा मुश्किल है भई किसी को अपनी तलब के बारे में समझाना। उसकी शिद्दत को समझाना। शायद अलग संदर्भ से आए व्यक्ति को आप अपने स्वाद और स्वाद में भी ख़ास चीज़ से उपजे स्वाद के बारे में पूरा नहीं समझा सकते। यहाँ आपकी पूरी संस्कृति दूसरी संस्कृति के सामने खड़ी हो जाती है। आपका परिवेश, आपकी परवरिश और आपका खानपान आपस में कितना गुँथा हुआ है, क्या हम कभी सोचते हैं ?

फ़िलहाल इमली की खोज एजेंडे पर सबसे ऊपर थी। घर बदला है हमने, इस वजह से चीज़ों की जगहें न स्थिर हुई हैं और न याद हुई हैं। मैंने सभी संभावित जगहों पर खोज डाला। अंततःयह प्रयास निष्फल नहीं हुआ। इमली मिल गई। कहाँ ? पार्कर कलम के टिन के डिब्बे में। डिब्बा नया था, इसलिए सहेज लिया गया था और सूखा होने के कारण इमली के लिए सुरक्षित था। यह इमली सूखी हुई थी और बिना चाईं के थी। अचानक मुझे ध्यान आया कि ऐसी इमली मैंने दिल्ली आकर ही देखी थी। उस समय बड़ी हैरानी हुई थी कि बड़े बड़े शहरों में क्या क्या मिलता है और लोगों की सुविधा का कितना ख्याल रखा जाता है। वरना इमली को पानी में फुलाकर उससे चाईं (बीज/गुठली?) निकालना एक बोरियत भरा काम होता था। होली में जब थोक भाव से दही बड़ा बना करता था और उसके साथ इमली की चटनी भी भर भर कटोरे बनती थी तब इमली से चाईं निकालने और उसका रेशा निकालने का काम मुझे थमा दिया जाता था। चलो उससे तो छुटकारा मिला ! 

अगली बार मैं दिल्ली से माँ के लिए भी बिना चाईं वाली सूखी इमली का प्लास्टिकबंद पैकेट ले गई थी। यह गृहिणी की तरफ से गृहिणी के लिए तोहफा था ! इमली की चाईं रसोइए का काम बढ़ाती थी तो खेल की चीज़ भी थी। मनकों की तरह उनका खेल में खूब इस्तेमाल हमलोग करते थे। सूख जाने पर चाईं एकदम हल्की हो जाती थी। गाढ़े कत्थई रंग की चाईं चमकती थी, फिसलती थी। एक बार मेरे भाई ने खेल खेल में उसको अपने कान में डाल लिया था।  कितनी मुश्किल हुई थी उसे निकालने में !  माँ ने बड़ी मेहनत के बाद हेयरपिन की मदद से चाईं को कान से निकाला था।  

जगह जगह का अंतर देखिए। पटना में जो पकी हुई इमली बाज़ार से आती थी वह गीली रहती थी। बहुत नफ़ासतवाली जगह से लो तो कभी कभार दोने में मिल जाती थी, नहीं तो अक्सरहा अखबार के टुकड़े में लपेटकर मिलती थी। उसका नतीजा होता था कि हमेशा कागज़ इमली में चिपक जाता था। कभी-कभी हमलोग उस कागज़ को भी चूस लेते थे जिसमें इमली की खटास आ जाती थी। कागज़ उतनी देर तक ही चूसते थे जब तक उसमें इमली का स्वाद आए। फिर भी इमली का लालच इतना होता था कि अक्सर कागज़ की सिट्ठी बन जाने तक हम उसे मुँह से निकालते नहीं थे।  जब इमली का आभास पूरी तरह मिट जाता था और कागज़ का स्वाद हावी होने लगता था तब हारकर हमलोग उसे फेंकते थे। सही मायने में यह पूरा प्रकरण पटना-दिल्ली के अंतर के अलावा उम्र और औकात के अंतर से भी जुड़ा था। 

आज मुझे जो इमली मिली वह मोटे अच्छे किस्म के प्लास्टिक में लिपटी हुई थी। इमली मात्रा में कम थी, लेकिन पुष्ट थी। मेरे छोले के लिए पर्याप्त थी। मैंने उसे धोकर कटोरी में पानी में भिगोकर रख दिया। तब तक हुआ यह कि मैंने पंजाबी छोले का इरादा तर्क कर दिया।प्याज-टमाटर कटा हुआ था तो जल्दी से चलता-फिरता छोला बना दिया। भीगी हुई इमली पड़ी रह गई। मुझे अहसास हुआ कि मैंने उसके साथ नाइंसाफ़ी की है। इसलिए कोंहड़े की सब्ज़ी में डालकर उसके साथ न्याय करने की कोशिश की। 

दिन गुज़र गया। शाम को एक दोस्त से व्हाट्सऐप पर गपियाते हुए अपनी अपनी दिनचर्या पर हम आ गए। इमली और इमली की खटास का मुद्दा फिर दिमाग में आया, लेकिन नेटवर्क गड़बड़ हो जाने से वह गपशप का विषय बनते बनते रह गया। इस बार मुझे इमली की खटास से अधिक इमली का वह पेड़ याद आया जिसके नीचे खड़े होकर हमदोनों स्कूल बस का इंतज़ार करते थे। हमीं नहीं, कई लड़कियाँ थीं। वह दरअसल एक कब्रिस्तान था। उसमें कब्रें थीं। ऊपर नीचे, अगल बगल। हमारे लिए वह ऊबड़ खाबड़ दिलचस्प जगह थी। वह सुनसान नहीं था। एक दो गैराज था वहाँ। इधर उधर पुराने टायर पड़े रहते थे। आते जाते समय पानी के टब में गाड़ी का टायर डालने पर  बुलबुले उठते हुए देखने में मज़ा आता था हमें। बगल में साइकिल पंक्चर बनानेवाला भी बैठता था। उस कब्रिस्तान को गुलज़ार बनाते थे इमली के पेड़। एक नहीं, कई पेड़ थे वहाँ। 

हमने कच्ची हरी हरी इमली खूब खाई थी वहाँ। इमली की छोटी छोटी हरी पत्तियाँ भी चबाई थीं। कभी कभी वह इमली इतनी बतिया होती थी कि एकदम कसैली लगती थी। उसमें खटास का दूर दूर तक नामो निशाँ नहीं था। भूले भटके उसमें सड़ी हुई, कीड़ों के छेदवाली इमली मुँह में चली जाती थी तो पूरा मज़ा किरकिरा हो जाता था। जब अधपक्की इमली मिल जाती थी तो दोस्तों को चिढ़ा-चिढ़ाकर हमलोग खाते थे। (आज सोचकर ही अजीब लगता है कि हमने कब्रिस्तान के पेड़ से इमली तोड़कर चटखारे ले लेकर खाई है। इतना ही नहीं, किसी धार्मिक का ध्यान इधर गया तो हंगामा ही खड़ा कर दे सकता है। यह तो विधर्मीवाला आचरण हो गया न ?)

इमली खाने के साथ उसको तोड़ने का भी अपना आनंद था। उसके लिए खूब ढेला चलता था। इमली के अलावा आम का पेड़ भी था जिसपर टिकोले के लिए निशानेबाज़ी होती थी। बगल में था इंजीनियरिंग कॉलेज का हॉस्टल जिसकी खिड़कियाँ उस कब्रिस्तान की तरफ खुलती थीं। मेरी दोस्त ने इमली और टिकोले के चक्कर में हॉस्टल की खिड़कियों के शीशों को भी नहीं बख्शा था। अभी उस दृश्य को याद करके हँसी आ रही है। ढेला चलाती किशोरी, उससे शहीद हुए शीशे और न जाने क्या क्या … 

अब इमली की मिठास घुलने लगी है मन में। जी हाँ, केवल इमली में खटास नहीं होती है। मिठास भी होती है। यह मामला 50-50 है या क्या, मालूम नहीं। उसका एक साथ खट्टा मीठा होना उसे जनप्रिय बनाने का कारण है, यह तय है। इन दिनों मैं सिर्फ इमली लेकर चुभला नहीं पाती हूँ। इमली की खटास छोले में या सब्ज़ी में या चटनी में तो चल जाती है, मगर खाली इमली की खटास बर्दाश्त नहीं होती है। खाने के पहले केवल सोचकर ही दाँत कोथ होने लगते हैं। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी दिन आएगा जब मैं इमली खा नहीं पाऊँगी - न कच्ची न पक्की। 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

सन्नाटा (Sannata by Purwa Bharadwaj)

अभी शब्दकोश लेकर बैठी हूँ. सन्नाटा की व्युत्पत्ति क्या है, यह शब्द कैसे बना है - जानना चाहती हूँ. मूल में क्या है और प्रत्यय क्या है?

इसे सुनते ही निस्तब्धता, नीरवता का बोध तो तुरत होता है, लेकिन क्या यह सबसे पहले किसी के अभाव का सूचक है ? जहाँ हरकत न हो, कोई स्वर न हो, कोई चेष्टा न हो, वही है सन्नाटा. यह भयावह स्थिति है और शायद इसलिए सन्नाटा पसरने से घबराहट होती है. अब चाहे दादरी में सन्नाटा हो या दिल्ली में ! 

इस हिसाब से सन्नाटा कब, क्यों और कहाँ छाता है, यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है. मुझे याद है 31 मार्च, 1997 का अगला दिन जब सीवान की सड़कों पर चंद्रशेखर को लेकर जुलूस जा रहा था. तब पूरे शहर में सन्नाटा छाया था. बीच-बीच में कुछ नारे उसे तोड़ते थे, मगर गूँज रहा था सन्नाटा.

मतलब साफ़ है कि सन्नाटे का कारण होता है. कोई ऐसा वैसा नहीं, बल्कि ज़बरदस्त कारण. चाहे वह घर के भीतर का सन्नाटा हो या इंसान के भीतर का या कौम के भीतर का.

सन्नाटे के कारण को खोजने से लोग परहेज़ करते हैं. उनको लगता है कि तब उँगली उठने लगेगी ताकतवर की ओर या तब जो सत्ता में है उसकी शिनाख्त की जाएगी. इससे दिक्कत होती है. खतरा रहता है कि उँगली कभी कहीं आपकी तरफ भी न उठ जाए. इसलिए बेहतर है कि सन्नाटे की कद्र की जाए. हो सके तो उसकी गुरुता, उसकी महिमा का बखान करने में हम सब शामिल हो जाएँ.

हिंसा से सन्नाटे का तार जुड़ता है. वह खुशनुमा की आँखों के सन्नाटे में दिखता है. जी हाँ, वही खुशनुमा जो नोमान की बहन है ! हिमाचल प्रदेश की रहनेवाली खुशनुमा जिसके भाई को लोगों ने गोरक्षा के नाम पर पीट पीटकर मार डाला था. या इरोम शर्मिला की आँखों पर गौर कीजिए ! आपको वहाँ भी सन्नाटा दिखेगा.

सन्नाटा जुड़ जाता है सूनेपन से, रिक्तता से. जब व्यक्ति विशेष के दायरे से निकलकर यह गलियों, चौराहों और शहरों में फैल जाता है तब कैसा लगता है, याद कीजिए. कर्फ्यू का दृश्य भी हो सकता है !

सच पूछिए तो सन्नाटा खतरनाक होता है. इससे डरना चाहिए. इसमें आवाजाही करने की मनाही रहती है. उसका पालन किया जाना चाहिए. यदि नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहिए. मुंबई के शक्ति मिल में जाने का दुस्साहस करनेवाली पत्रकार की ‘दुर्दशा’ आखिर इसीलिए हुई न कि उसने सन्नाटे में जाने का खतरा मोल लिया था !

इससे यह पता चलता है कि सन्नाटा सबके लिए एक सा नहीं होता है. किसी के लिए यह फायदेमंद भी हो सकता है. खासकर अपराध के लिए यह माकूल माहौल प्रस्तुत करता है. मानते हैं कि भूत-प्रेत-जिन्न वगैरह भी इसी में सक्रिय होते हैं.

लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि सन्नाटे का लाभ हमेशा बुरे या असामाजिक तत्त्व ही उठाएँ. नज़र बचाकर मनमर्ज़ी करने का मौका भी यह देता है. किसी को घर से भागने का तो किसी को घर लौटने का !

जो भी हो लोगों की नज़र में रहता है सन्नाटा. वे लगातार इस पर सोचते हैं, बात करते हैं. उसे परिभाषित करने की कोशिश करते हैं. अभी मुझे मुक्तिबोध याद आ रहे हैं. वही क्यों, ब्रेख्त, महमूद दरवेश और अनगिनत रचनाकार याद आ रहे हैं. चित्रकार याद आ रहे हैं जो सन्नाटे को अलग अलग रंग देते हैं और अलग अलग रेखाओं व आकृतियों से उसे घेरने का प्रयत्न करते हैं.

मणि कौल की फिल्म भी याद आ रही है जिसके सन्नाटे को देखकर बचपन में हम भाई-बहन घबरा जाते थे. दरअसल यह घबराहट ऊब के कारण होती थी. सन्नाटे से सचमुच ऊब होती है. उसे तोड़ने का मन करता है. कम से कम जब तक हम बच्चे थे हमें सन्नाटा एकदम पसंद नहीं था.

बड़े होते जाने के साथ हम सीखने लगते हैं कि सन्नाटे से नज़र चुराकर निकल जाओ. कहीं और बस जाओ ताकि उससे छुटकारा मिल जाए. हम शोरगुल में रहने में इत्मीनान महसूस करते हैं. हम सोचते हैं कि हमारे आसपास सन्नाटा नहीं है तो इसका मतलब है कि सबकुछ सामान्य है. हमें क्या, सबको लगता है कि सन्नाटे में हमारी हिस्सेदारी नहीं है, इसलिए इससे बचना मुमकिन है.

धीरे-धीरे यह अहसास होता है कि सन्नाटा मारक होता है. एक बिंदु आता है जब यह स्थिति असह्य होने लगती है. हमें दूसरी जगह पर छानेवाला सन्नाटा भी खलने लगता है. हम चाहने लगते हैं कि सन्नाटा टूटे, कोई न कोई चीखे. कोई न कोई प्रतिरोध करे.

फिर भी न चाहते हुए भी ज़्यादातर बार सन्नाटा लंबा खिंच जाता है. कभी कभी तो साल क्या, शताब्दियाँ गुज़र जाती हैं. बहुत सी बातें ऐसी हैं, बहुत से पहलू ऐसे हैं कि अभी तक उन पर सन्नाटा छाया हुआ है. उनकी निशानदेही ही नहीं हुई है तो भला सन्नाटा टूटेगा कैसे

अहम सवाल होता है कि पहल कौन करेगा. सन्नाटे में पहला पत्थर कौन उठाएगा ? अंकुर फिल्म का अंतिम दृश्य याद आता है. जब एक बच्चा पत्थर फेंकता है तो अधिकांश (कम से कम सुधी दर्शकों में से 60%) राहत महसूस करते हैं. उनको लगता है कि उनका प्रतिनिधित्व हो गया. वे तब आराम से घर लौटकर अपने अपने सन्नाटे से आँख चुरा लेते हैं.

सबसे अधिक सुविधाजनक है कि खूब शोर करो. इतना चिल्ल पों मचाओ कि सन्नाटे का पता ही न चले. कोई उसको सूँघ न ले, किसी के दिल में उसका अहसास न हो. 

जिनको सन्नाटा चुभता है, वे दरअसल खतरनाक लोग होते हैं. वे राजनीतिक होते हैं. वे किसी न किसी साजिश की टोह लेते रहते हैं. या कहिए कि वे दिग्भ्रमित लोग हैं. उनकी स्मृति ख़राब होती है क्योंकि वे बहुत पहले की बात याद रखते हैं और एक एक सन्नाटे की कड़ी जोड़ते चलते हैं.

सन्नाटे का जाल होता है. मकड़ी के जाल की तरह उसकी बनावट पारदर्शी होती है. उसी की तरह वह अक्सर आँखों से ओझल होता है. वह जाल भँवर की तरह दबोचता है और अपने में गर्क कर लेता है. उसमें कुछ खुद फँसते हैं, कुछ फँसा दिया जाते हैं. कुछ को इसका बोध होता है और कुछ अपनी अबोधावस्था को चरम सुख मानते हैं.

एक सवाल यह भी है कि चुप्पी और खामोशी अर्थ लेने पर क्या सन्नाटे का वही अर्थ द्योतित होता है ? शायद नहीं.   


शनिवार, 4 जुलाई 2015

दोपहर (Dopahar by Purwa Bharadwaj)

आज की दोपहर अनमनी सी बैठी थी तो मनमाफ़िक का ध्यान आया. अरे, मैं हूँ कहाँ ? तीन साल गुज़र गए, 19 जून की तारीख भी बीत गई और मुझे ध्यान नहीं आया कि मनमाफ़िक की सालगिरह थी. 19 जून, 2012 को ऐसी ही एक दोपहर थी जब मैंने मनमाफ़िक शुरू किया था.

दोपहर अक्सर अकेलापन और खालीपन लेकर आती है. उस दिन भी मैं अकेली थी. कविताओं और कहा जाए तो साहित्य की दुनिया से बढ़ती जा रही दूरी से जो छटपटाहट हो रही थी उसे दूर करने के लिए मैंने सोचा कि मैं अपनी मनपसंद रचनाओं का संकलन तैयार करूँ. उत्साही जीव तो मैं हूँ ही, फिर कोई रुकावट थी नहीं. तकनीकी जानकारी के अभाव ने भी मेरे उत्साह पर पानी नहीं डाला. पसंदीदा कविताओं के बीच से मैंने विजय देव नारायण साही की कविता टाइप कर डाली और उसे ब्लॉग पर डाल दिया. अगले दिन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे. लेकिन फिर मुझे अहसास हुआ कि मनमाफ़िक मेरे सिवा किसी को दिख ही नहीं रहा. ऐसे में अपने दोस्त कब्बू से ही पूछा जो बीच-बीच में ब्लॉग को लेकर मेरी जानकारी बढ़ाता रहता था. उसने लैपटॉप लिया और सर्च इंजन की सेटिंग दुरुस्त कर दी. मुझे उसने View और पूरा Stat देखना सिखलाया. उसके बाद मेरे उत्साह में जो इज़ाफा हुआ उसका क्या कहना!

लेकिन आज उत्साह नहीं है. दोपहर भी तो एक सी नहीं होती है. हर दोपहर अलग होती है - भाव में, रंग-रूप में और छोटाई-बड़ाई में भी. ज़रूरी नहीं कि धूप का चटकीलापन या हवा का रुख ही उसे अलग करे. शायद एक को दूसरे से अलग बनाने में मन का भाव ही सबसे अहम भूमिका निभाता है.

मुझे ऐसी अनगिनत दोपहर याद हैं जब पटना कॉलेज के गंगा किनारेवाले वाणिज्य (कॉमर्स) भवन से लेकर बी.ए.लेक्चर थियेटर, लाइब्रेरी और सड़क पार के PBH का हम चक्कर लगाया करते थे. खासकर PBH हमारा अड्डा था जहाँ AISF के साथियों का हर वक्त जमावड़ा रहता था. तब लेफ्ट राइट करते हुए मुझे कभी अहसास नहीं हुआ कि वह अक्सर दोपहर का ही समय हुआ करता था.

माँ ज़रूर गुस्सा होती थी कि खड़ी दोपहर में कहाँ-कहाँ घूमती रहती है लड़की. हँसी आती थी कि खड़ी दोपहर और बैठी दोपहर और सोई दोपहर क्या होता है. भरी दोपहर का मतलब भी तब समझ में नहीं आता था. अब जब हिंसा की खबरें देखती हूँ तो माँ की चिंता समझ में आती है. सुनसान होना दोपहर का एक गुण है और वह खतरनाक माना जाता है. किंचित् रहस्यमय भी. दोपहर में किसी ठूँठ पर बैठे जिन्न-प्रेत के किस्से याद कीजिए या सफ़ेद चादर में लिपटी किसी आकृति को.

मध्याह्न कहने पर सीधा ध्यान जाता है कि यह दिन के बीचो बीच का समय है जब सूरज ठीक हमारे सर पर होता है. बीचो बीच का मतलब मझधार समझिए या यह कि आधा सफ़र कट गया, यह निर्भर करता है आपके नज़रिए पर. सकारात्मक हैं आप तो कहेंगे कि आप मंज़िल की ओर बढ़ते जा रहे हैं, वरना नकारात्मक बंदा इसे ढलान ही मान लेगा. जब जब हेमंत कुमार की आवाज़  में मैं "बस एक चुप सी लगी है" मुखड़े वाला गीत सुनती हूँ तो इन पंक्तियों पर ज़रूर ठहरती हूँ - " सहर भी ये रात भी/ दोपहर भी मिली लेकिन/ हमीं ने शाम चुनी"

जीवन की दोपहर को देखें. यह परीक्षा की घड़ी भी बन जाती है. उसमें उम्मीद की जाती है कि आप तनकर खड़े रहें. उस वक्त इसका रिश्ता उम्र से नहीं रह जाता है. छाँह हो या न हो इस दोपहर से पार पाना होता है. इसका मतलब क्या यह है कि दोपहर जिजीविषा का उत्स है ?

कठिनाई से दोपहर का रिश्ता सीधा है. आप कोई बैठक या धरना-जुलूस या नाटक के रिहर्सल का समय दोपहर रख कर जाँच लीजिए. वह अलग बात है कि दोपहर में भोज-भात हो तो उपस्थिति हो जाती है. दोपहर के भोजनवाले सत्र के ठीक पहले तो सेमिनार में भी संख्या बढ़ने की उम्मीद की जाती है. कई बार लोगों को खींचने के लिए दोपहर के भोजन को चुंबक की तरह इस्तेमाल किया  जाता है. लोगों की यह सोच बच्चों के लिए स्कूलों में दिए जा रहे दोपहरी के भोजन को लेकर भी है. वह कितना उपकरणात्मक  इस्तेमाल है और कितना अधिकार, यह लोग जानते हैं. मानें भले नहीं. हमारे आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो दोपहरी के भोजन खानेवाले बच्चों के प्रति अपने हिकारत के भाव को छुपाने की ज़हमत भी नहीं उठाते.


इसी से ध्यान आया कि दोपहर एक मापदंड भी है. यदि स्कूल में दोपहर तक बच्चे टिक गए, दफ्तर में साहब और बाबू लोग टिक गए तो मानिए कि सबकुछ बढ़िया चल रहा है. दोपहर बाद तक टिकना तो सफलता की कसौटी पर खरा उतरना है. यह इसका प्रमाण है कि काम की गुणवत्ता अच्छी है. औचक निरीक्षण भी कई बार दोपहर बाद किया जाता है ताकि सच्चाई का पता चले. वह अधिकारी लोग अधीनस्थों का करते हैं. उन अधीनस्थों की सूची बड़ी लंबी होगी और वह कभी कभी मज़ेदार किस्सों से भरपूर हो सकती है ! 

अलग अलग पाली (शिफ्ट) में काम करनेवालों के लिए बहुत बार दोपहर सुबह की तरह होती है यानी दिन की शुरुआत. कुछ ऐसे पेशे भी हैं जहाँ पाली का चक्कर हो या न हो लोग दोपहर में दफ़्तर पहुँचते हैं. जैसे अख़बार या इलेक्ट्रोनिक मीडिया वगैरह में (ज़ोर वगैरह पर है क्योंकि किसी को बदनाम करने का मेरा इरादा नहीं है.) काम करनेवाले बहुत सारे लोग. इसे कहते हैं सुख. वैसे कामकाजियों के बीच आरामतलब लोगों की पहचान घुलमिल जाती है और हम केवल रश्क करते हुए रह जाते हैं !

दोपहर का सुख नींद से बहुत जुड़ा हुआ है. जब सारी रात जगकर कोई नौजवान फिल्म देखे या गप्प मारे और उसे दोपहर तक सोने को मिल जाए तो उससे बढ़कर क्या हो सकता है !  हमें तो उतना नसीब नहीं है, मगर कभी कभार दोपहर की नींद खींचने को ज़रूर मिल जाती है. नींद न सही, इत्मीनान भरी दोपहर तो मिल ही जाती है. उसमें पुराने टीवी धारावाहिक देखो या पड़ोसन से गप्प करो या कागज़ काले करो. ऊब हुई तो साथी बनेंगे फोन या लैपटॉप. 

छुट्टी के संदर्भ में दोपहर का महत्त्व विवाद से परे है. स्कूलों में इस दोपहर की छुट्टी का जितना बेसब्री से इंतज़ार होता है उससे कम दूसरों को नहीं होता है. खाना, खेलना, पेंगे बढ़ाना, फरियाना सबकुछ होता है. फुरसत के इन पलों में छिटपुट काम निपटा लिए जाते हैं. इस तरह सुस्ती लेकर आनेवाली दोपहर आपकी गति भी बढ़ा देती है. माँ कभी बटन टाँकती हुई नज़र आती थी तो कभी कपड़े तह करते हुए. मेरी एक दोस्त कपड़े इस्त्री करने के लिए दोपहर चुनती है तो दूसरी को बेकिंग में नया आजमाने के लिए दोपहर की शांति अच्छी लगती है. घरेलू चिल्ल-पों से तात्कालिक राहत की यह घड़ी शौक पूरा करने के काम आती है. भूले-बिसरे गीत सुनो या पेंटिंग करो या कुछ भी मनमाफ़िक करो !

दोपहर में कौन क्या करता है, इसका सर्वेक्षण कराना चाहिए. है न ? क्योंकि दोपहर का रिश्ता ढूँढने से भी है.

गुरुवार, 28 मई 2015

धुँधलापन (Dhundhalapan by Purwa Bharadwaj)

कभी-कभी मुझे लगता है कि ज़िन्दगी और कुछ नहीं धुँधलापन है और उसको साफ़ करते रहने की जद्दोजहद है. आज फिर कुछ पुरानी तस्वीरें हाथ लग गईं. उनमें से कुछ धुँधली ज़रूर हो गई हैं, लेकिन खुशी है कि याददाश्त धुँधली नहीं हुई है. फिर धुँधलेपन से घबराना क्यों ? यह भी तो द्वैध में, binary में चीज़ों को देखना ही है ! या तो एकदम शीशे की तरह साफ़ हो या एकदम ओट में हो, काला हो या सफ़ेद हो ? रिश्तों में भी हम यही करते हैं. या तो एकदम दिल मिले हुए हों या एकदम दिल से निकाल बाहर फेंको. ऐसा होता तो नहीं है ! बहुत लोग ज़ेहन में, दिलो दिमाग में रहते हैं और वास्तव में वे वहाँ होते नहीं हैं. इसी तरह बहुतों के बारे में यह लगता है कि वे छूट गए हैं या भुला दिए गए हैं, फिर भी वे किसी कोने में दुबके रहते हैं. बहुत लोग उस धुँधली सी जगह में रहते हैं जिससे हम भी बेखबर रहते हैं. कुछ ऐसा ही लगा मुजीब रिजवी साहब के अंतिम संस्कार के समय. 

दिल्ली को गाली देनेवालों की कमी नहीं है और मैंने गाली भले नहीं दी, मगर लंबे समय तक उसको अपनी जगह मानने से भागती रही. पटना को भूल पाना, उसकी मंडली से बिछड़ जाना आसान नहीं था. लेकिन मुजीब साहब जैसे आत्मीय लोगों के व्यवहार से मुझे यह लगने लगा कि दिल्ली उतनी भी बेदिल नहीं जितना लोग कहते हैं. मेरे पापा की उम्र के रहे होंगे मुजीब साहब. अपूर्व ने महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय में उनके साथ दो-तीन साल करीब रहकर काम किया था. जब ईद आई तो पटना में न रहना और चुभने लगा था. दिल्ली की हमारी दूसरी ईद रही होगी जब हम सपरिवार मुजीब साहब के यहाँ गए. मैं चूँकि ताबां साहब की कविताओं की प्रशंसक थी और प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों और सम्मेलन के दौरान उनसे मिल भी चुकी थी, इसलिए मैंने मुजीब साहब को उनके दामाद के रूप में देखा. पहली ही बार में मुझे लग गया कि मेरी ईद तो हो गई. तरह-तरह की सेवइयों से नहीं, मुजीब साहब के दुलार और ख़ुलूस से ! अज़रा जी से मुलाकात हुई, सहबा से भी. मेरी बेटी छत पर जाकर घर के बच्चों के साथ खेलने भी लगी. हमलोग खुश-खुश घर लौटे. त्यौहार में कई साल उनके यहाँ जाते रहे. लेकिन जैसा कि होता है धीरे-धीरे संपर्क छूट गया. कई-कई साल बीत गए और हम ईद में दूसरी जगह जाने लगे. ज़ाकिर नगर की भीड़भाड़ वाली जगह का बहाना हमें दूर करता गया. धुँधलापन तारी होता गया. 

बीच-बीच में मन कचोटता था. ग्लानिवश हम एक-दो बार बिना त्यौहार के भी उधर गए. सुखदेव विहार में पिछले साल दो बार गए थे. एक बार बहुत बीमार थे मुजीब साहब. हमें अपने पर गुस्सा आया कि जिनका स्नेह हम नहीं भूल पाते हैं उनको भी क्यों भुला देते हैं. फिर यह भी लगता था कि उनसे बहुत नज़दीकी तो रही नहीं कभी. अपूर्व काम के सिलसिले में या बैठकों में जहाँ-तहाँ मिल भी लेते थे, मगर मेरा गाहे-बगाहे ही मिलना हुआ था. तब भी ताज्जुब है कि मुजीब साहब बहुत अच्छे लगते थे और अपने लगते थे. बाद के दिनों में महमूद से दो-चार बार उनका हालचाल लिया था, मगर इधर कोई खबर नहीं थी. क्या स्मृति में धुँधलेपन ने जड़ जमा लिया था ? लेकिन यही तो सच्चाई है जीवन की !

मैं भूल गई थी कि कब्रिस्तान में आम तौर पर औरतें नहीं जाती हैं. अली जावेद साहब साथ थे, परंतु वे ठहरे कम्युनिस्ट आदमी ! उन्होंने मुझे टोका नहीं. मैं जामिया की मस्जिद के मैदान में जनाज़े की नमाज़ पढ़नेवालों की कतार से थोड़ी दूर एक पेड़ की छाँह में खड़ी थी. मुजीब साहब दूर में थे, मगर आँखों से ओझल ! ख़ामोशी थी और मुझे मुजीब साहब का ठहाका याद आ रहा था. जल्दी ही पास के कब्रिस्तान की तरफ़ लोग बढ़े. मैं हिचकते हुए वहाँ भी गई. हालाँकि किसी ने मुझे अजीब निगाह से नहीं देखा. मुजीब साहब की जमात थी यानी प्रगतिशीलों की. हिंदीवाले कुछ लोग थे जिनको मैं पहचानती थी. बाकी रिश्तेदार और जामिया के लोग लगे. धीरे-धीरे मिट्टी डालकर लोग छितराने लगे. मेरा मन किया कि मैं भी जाऊँ, लेकिन कैसे जाती ! एक और औरत वहाँ दिखी, मगर कोई रस्म में शरीक होने को कहता तब न ! मैं सोचने लगी कि रस्में मुझे पसंद नहीं हैं, फिर यह इच्छा क्यों हुई ! क्या मेरी 'Politics' में धुँधलापन है ?

श्मशान घाट पर बहुत बार गई हूँ, परंतु कब्रिस्तान में जाने का यह पहला मौका था. अपूर्व को यह जानकार हैरानी हुई. उन्होंने पूछा कि मेहर आंटी (मेरी दोस्त अफ्शां की माँ) के समय तुम कब्रिस्तान नहीं गई थी. मैंने इनकार में सिर हिलाया और सोचा कि इतने दिनों तक तो यह सवाल तक मेरे मन में नहीं उठा था. वैसे कब्रिस्तान में मुझे अटपटा नहीं लगा. यह अवश्य सोच रही थी कि क्या मेरे भी मुसलमान दोस्त-अज़ीज़ कम हैं ! मैं कितना कम जानती हूँ इन रस्मो रिवाज को और क्यों कम जानती हूँ ! क्या सिर्फ ईद-बकरीद मनाने के लिए दोस्त-अज़ीज़ हैं ? या दंगों और सांप्रदायिक तनाव पर चर्चा करने के लिए हैं ? फिर हम अपने रस्ते और वे अपने रस्ते. रस्ते मिलते क्यों नहीं हैं ?  नज़र धुँधलाने की हद पर दूर जाकर भी वे मिलते हुए नहीं दिखते हैं ! 

दफ़न संस्कार चल रहा था. आफ़ताब साहब उधर से आए और बोले कि आते हैं, अम्मां यहीं हैं. एक क्षण के लिए मैं गड़बड़ा गई. समझ में कुछ नहीं आया. तुरत ध्यान गया कि आफ़ताब साहब की अम्मां उसी कब्रिस्तान में हैं. आफ़ताब साहब को मैंने दूर से चुपचाप खड़े देखा. मेरा मन कैसा-कैसा हो गया. अम्मां याद आ गईं. वही जो ख़ूब पढ़ती थीं, खुदाबख्श लाइब्रेरी जाया करती थीं, पूरे घर पर राज करती थीं. पटना का राजेंद्रनगर का 11 डी का मकान आँखों में तिर गया जहाँ से मैंने गृहस्थी की शुरुआत की थी. कहने को हमारी मकान मालकिन, लेकिन हम सबके लिए भी अम्मां थीं. उनका कमरा मेरे डाइनिंग हॉल से सटा हुआ था, लेकिन दोनों तरफ की चिटखनी चढ़ी रहती थी. ख़ास ख़ास मौकों पर वह खुलती भी थी, लेकिन अम्मां का रुआब इतना था कि हम यदि जाते भी तो दबे पाँव और बोलते भी तो दबे गले से. खासकर मैं. अम्मां बहुत दुबली-पतली छोटे कद की थीं. उसमें उनका ऊँचा व्यक्तित्व सामनेवाले को खासा प्रभावित करता था. जब वे लोग राजेंद्रनगरवाले घर से चले गए थे तो कभी-कभी त्यौहार में सपरिवार वहाँ आते थे. एक दिवाली की बात है. मेरे घर के ऊपरवाले हिस्से में नए किरायेदार आ गए थे. अम्मां आईं. हमारे घर आईं. बगल में नीरा भाभी के यहाँ बैठीं. मैंने पूछा कि अम्मां ऊपर भी जाइएगा क्या. उन्होंने कहा कि पुराने रिश्ते चल जाएँ अब यही बहुत है और यही कोशिश है. कितनी मार्के की बात है ! मैं उनकी यह बात कभी नहीं भूलती हूँ. लौटते में आफ़ताब साहब के साथ हमदोनों भी अम्मां के पास गए. कब्र पर अम्मां की तरह ही सादे ढंग से लिखा था सादिया आलम. मेरी नज़र धुँधलाने लगी...

गुरुवार, 14 मई 2015

मैं डरता हूँ मुसर्रत से (Main darta hoon musarrat se by Meeraji)

मैं डरता हूँ मुसर्रत से 
कहीं ये मेरी हस्ती को 
परीशाँ, कायनाती नग्म-ए-मुबहम में उलझा दे 
कहीं ये मेरी हस्ती को बना दे ख़्वाब की सूरत !

मेरी हस्ती है इक ज़र्रा
कहीं ये मेरी हस्ती को चखा दे मेह्रे-आलमताब का नश्शा !
सितारों का अलमबरदार कर देगी मुसर्रत मेरी हस्ती को 
अगर फिर से उसी पहली बलन्दी से मिला देगी 
तो मैं डरता हूँ - डरता हूँ 
कहीं ये मेरी हस्ती को बना दे ख़्वाब की सूरत !

मैं डरता हूँ मुसर्रत से 
कहीं ये मेरी हस्ती को 
भुलाकर तल्खियाँ सारी 
बना दे देवताओं सा 
तो फिर मैं ख़्वाब ही बनकर गुज़ारूँगा
जमाना अपनी हस्ती का। 


मुसर्रत = आनंद 
हस्ती = जीवन, अस्तित्व 
परीशाँ = बिखरा हुआ 
कायनाती = सृष्टि में व्याप्त  
नग्म-ए-मुबहम = अस्पष्ट गीत 
मेह्रे-आलमताब = दुनिया को आलोकित करनेवाला सूरज 
अलमबरदार = ध्वजवाहक 
तल्खियाँ = कड़वाहटें


शायर - मीराजी 
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : मीराजी 
संपादक - नरेश 'नदीम'
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010


रविवार, 22 मार्च 2015

दिनान्त पर आलू (Dinant par aaloo by Gyanendrapati)


सुबह सब्जी-मण्डी से गुजरते हुए 
बाजार में नए-नए आए 
ललछौंह आलुओं को देखा था 
सट्टी से सड़क तक उमड़े पड़ रहे थे 
नए-नए आए ललछौंह आलू 
घर-घर तक फ़ैल जाने को अधीर 
डलियों की चौड़ी अंजलियों में भरे लबालब 
पेटू झोलों के दन्तहीन मुँह में झाँकते उत्सुक 

दिन बिताकर 
उधर से लौटते हुए 
सँवलाए हुए दिखते हैं बचे हुए आलू 
उठ जाने से पहले उठे जाते हुए पैठ के साथ 
दिखते हैं मटैले धुमैले 
दिन-भर में ही जाने कितनी दुनिया देखे 
बाजार के रंग-ढंग 

ममतालु किसान-हाथों की मेहनती मजूर उँगलियों से 
ज़मीन की रात से उखाड़कर लाए हुए वे 
दिखते हैं 
रात की ज़मीन को छूते हुए 
थकी निदासी देह की कनपटी से 
और मैं देखता हूँ. आलुओं की देह के 
कार्बोहाइड्रेट में कहाँ से घुलती-मिलती है करुणा 
करुणा - जिसे छिलके के साथ छुड़ाकर 
शेष कार्बोहाइड्रेट को कतर-कतर 
चिप्स में बदलती हैं पैकेटबन्द खाद्यनिर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ 
उन्हें भरतीं पारदर्शी प्लास्टिक-कारागार में 
लाभ-लोभ के सर्वग्रासी जबड़ों के बीच लपलपाती जीभ को सौंपने 



कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शनिवार, 21 मार्च 2015

केवल यही (Kewal yahi by Eliseo Diego)


कविता कुछ नहीं है 
सिवा एक प्राचीन स्टोव की चढ़ती 
परछाईं में बातचीत के 
जब सब चले गए हों,
और दरवाज़े के बहार 
अभेद्य वन सरसरा रहे हों। 

कविता केवल कुछ भ्रम है 
जिनसे किसी को प्यार हो,
और जिनका क्रम समय ने बदल दिया हो,
जिनमें कि अब 
केवल एक संकेत,
एक अनभिव्यक्त आशा,
बास करती हो। 

कविता और कुछ नहीं है 
सिवा आनंद के, परछाइयों में 
बातचीत के,
जबकि और सब कुछ विदा ले चुका हो 
और केवल खामोशी हो। 



क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो (2.7.1920 - 1.3.1994)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

बुधवार, 18 मार्च 2015

श्वेत वस्त्र (Shwet vastra by Arutprakasa Vallalar Chidambaram Ramalingam)

आज कपड़ों और रंगों की बात हो रही थी कि तमिल पुनर्जागरण के अग्रदूत रामलिंग स्वामी के कथन पर नज़र पड़ गई. उन्होंने अपने एक प्रवचन में कहा है -

गेरुए वस्त्र युयुत्सा के द्योतक हैं -
युयुत्सा उस व्यक्ति की, जो लड़ता है,
अपनी ही प्रकृति से,
जिसने पराजय कर लिया है प्रकृति को,
प्राप्त किया है करुणा को,
श्वेत वस्त्र उचित हैं उसके लिए। 

अपने श्वेत वस्त्रों के बारे में रामलिंग स्वामी एक पद्य में कहते हैं -

झूलते हुए हाथों से शरमाकर 
मैं हाथ जोड़े चलता रहा 
नग्न होने की अनिच्छा से,
ढंक लिया अपने शरीर और सिर को,
सफेद वस्त्र में,
मैंने देखा नहीं उस ओर
जहां चालाकी टहलती हो,
मैं दुखी हो जाता,
वरना। 

अन्यत्र उनका कहना है -

मैं दुखी हुआ,
जब मित्रों ने सुनहले किनारे की
धोती, मुझे पहनायी,
कितना व्याकुल हो गया था मैं 
हे प्रभो !
फिर वह घबराहट,
जब उन्होंने भरी धूप में,
छतरी तान दी, मेरे सिर पर,
कांप गया मैं !
मैंने हाथों का रूमाल 
खोंस लिया था कमर में,
ताकि हाथ जुड़े रहे,
तेरी प्रार्थना करते रहे। 

आगे वे कहते हैं -

ऊँचे आसन मुझे 
अव्यवस्थित करते हैं,
पैरों के ऊपर पैर 
मुझे अभिनय-सा प्रतीत होता है,
नहीं सो सकता मैं 
नरम गद्दों पर,
मंच पर बैठकर मैं 
नहीं लटका सकता अपने पांव ;
ऊंची आवाजें 
भयभीत करती हैं मुझे,
हे मां, मुझे इन सबसे बचाओ !


कवि - रामलिंग स्वामी (1823 - 1874)
किताब - रामलिंग : कवि एवं पैगम्बर 
लेखक - पुरसु बालकृष्णन
अनुवाद - सुमति अय्यर 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 1991

रविवार, 15 मार्च 2015

कमइया हमार चाट जाता (Kamaiya hamaar chaat jata by Mahendra Shastri)

कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जेकरा आगे जोंको फीका 
अइसन ई कसइया 
दूहल जाता खूनो जेकर 
अइसन हमनी गइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

अंडा-बच्चा साथे हमरा 
दिन-दिन भर खटइया 
तेहू पर ना पेट भरे 
चूस लेता चँइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

एकरा बाटे गद्दा-गद्दी 
हमनी का चटइया
एकरा बाटे कोठा-कोठी 
हमनी का मड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जाड़ा में बा ऊनी एकरा 
खाए के मलइया 
हमनीं का त रातो भर 
खेलाइलें जड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 



भोजपुरी कवि - महेन्द्र शास्त्री 
संकलन - हिन्दी की जनपदीय कविता 
संपादक - विद्यानिवास मिश्र 
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002

शनिवार, 14 मार्च 2015

केवल मेरा दुख (Kewal mera dukh by Sanjay Shandilya)


सबका दुख है 
मेरा दुख
बहुत घनेरा दुख

मेरा दुख तो 
मेरा दुख
केवल मेरा दुख l


कवि - संजय शांडिल्य 
संकलन - उदय-वेला 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है (Khalish bhi aaj to kuchh kam hai by Gulam Rabbani Taban)

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है दर्द भी कम है 
चराग़ तेज़ करो हाय रौशनी कम है 

उदास उदास है महफ़िल तही हैं पैमाने 
शराब कम है अज़ीज़ो कि तश्नगी कम है 

हमारे साथ चलें आज कू-ए-क़ातिल तक 
वो बुलहवस जो समझते हैं ज़िंदगी कम है 

अभी तो दोश तक आई है ज़ुल्फ़े-आवारा 
अभी जहाने-तमन्ना में बरहमी कम है 

चराग़े-गुल न जले कोई आशियां ही जले 
जुनूं की राहगुज़ारों में रौशनी कम है 

बस और क्या कहें अहबाबे-तंज़-फ़र्मा को 
शऊर कम है, नज़र कम है, आगही कम है 

रहे है मह्व, सनम को ख़ुदा बनाए हुए 
सुना है इन दिनों 'ताबां' की गुमरही कम है 



ख़लिश = कसक 
तही = ख़ाली 
तश्नगी = प्यास 
 कू-ए-क़ातिल = क़ातिल (प्रिय) के कूचे तक 
बुलहवस = विलासी 
दोश = कंधे 
जहाने-तमन्ना = अभिलाषाओं का संसार 
बरहमी = आक्रोश, उन्माद 
अहबाबे-तंज़-फ़र्मा = कटाक्ष करनेवालों को 
शऊर = चेतना 
आगही = ज्ञान 
मह्व = डूबा रहता है, तन्मय 
सनम = बुत 


शायर - ग़ुलाम रब्बानी ताबां 
संकलन = जिधर से गुज़रा हूँ 
संपादक = दुर्गा प्रसाद गुप्त 
प्रकाशक = शिल्पायन, दिल्ली, 2014 

मेरे कॉलेज के दिनों की किसी कॉपी में लिखी यह रचना आज दशकों बाद ताबां साहब के नए संकलन में मिली है. उन दिनों भी मुझे ताबां साहब पसंद थे और आज भी पसंद हैं. 

सोमवार, 9 मार्च 2015

जी देखा है, मर देखा है (Jee dekha hai, mar dekha hai by Habeeb 'Jalib')

जी देखा है, मर देखा है
हमने सब कुछ कर देखा है

बर्गे-आवारा की सूरत 
रेंज-ख़ुश्को-तर देखा है

ठंडी आहें भरनेवालों 
ठंडी आहें भर देखा है

तिरी ज़ुल्फ़ों का अफ़साना 
रात के होंटों पर देखा है

अपने दीवानों का आलम 
तुमने कब आकर देखा है !

अंजुम की ख़ामोश फ़िज़ा में 
मैंने तुम्हें अकसर देखा है

हमने बस्ती में 'जालिब'
झूठ का ऊँचा सर देखा है। 



शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'
संपादक - नरेश नदीम 
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

फूलमंडनी (Phoolmandani by Chheetswami)

फूलनि के भवन गिरिधर नवल नगरी,
फूल सिंगार करि अति ही राजै। 
फूल की पाग सिर स्याम के राजही,
फूल की माल हिय में बिराजै ।। 
फूल सारी, कंचुकी बनी फूल की,
फूल लहंगा निरखि काम लाजै। 
छीतस्वामी फूल-सदन, बिलसत प्यारी संग,
मिलवत अंग, अनंग दाजै ।। 



ब्रज के मंदिरों में ग्रीष्म ऋतू में लकड़ी के बने चौखटों पर फूलों के माध्यम से अत्यंत कलात्मक जाल काटे जाते हैं और उन चौखटों से भवननुमा अनेक प्रकार से महल बनाए जाते हैं, जिनमें तिदरी, छज्जे आदि वास्तुकला के अनेक नमूने होते हैं। इन कलाकृतियों को 'फूल बांगला' नाम से जाना जाता है।  इन्हीं बंगलों में देव विग्रह को विभूषित किया जाता है। 


कवि - छीतस्वामी 
संकलन - अष्टछाप कवि और उनकी रचनाएं : छीतस्वामी 
संपादक - डा. वसंत यामदग्नि 
प्रकाशक - प्रकाशन विभाग, दिल्ली, 2003 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

मेरे सहचर मित्र (Mere sahchar mitra by Muktibodh)

मेरे सहचर मित्र
ज़िन्दगी के फूटे घुटनों से बहती 
रक्तधार का ज़िक्र न कर,
क्यों चढ़ा स्वयं के कन्धों पर 
यों खड़ा किया 
नभ को छूने, मुझको तुमने। 
अपने से दुगुना बड़ा किया 
मुझको क्योंकर ?
गम्भीर तुम्हारे वक्षस्थल में 
अनुभव-हिम-कन्या 
गंगा-यमुना के जल की 
पावन शक्तिमान् लहरें पी लेने दो। 
ओ मित्र, तुम्हारे वक्षस्थल के भीतर के 
अन्तस्तल का पूरा विप्लव जी लेने दो। 
उस विप्लव के निष्कर्षों के 
धागों से अब 
अपनी विदीर्ण जीवन-चादर सी लेने दो। ...


कवि - मुक्तिबोध 
संकलन - चाँद का मुँह टेढ़ा है 
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2001 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

बाँसुरी की फूँक (Bansuri ki foonk by Nandkishore Nawal)


जिस छिद्र में फूँक भरने से 
मेरी बाँसुरी बजती है,
तुमने उसी में फूँक भरी है। 

उस फूँक से जो स्वर निकलेगा,
उससे सारा जंगल हिल उठेगा। 
पक्षी बोल उठेंगे,
हवा चल पड़ेगी,
फूल खिल उठेगा। 
                    - 7. 3. 1976 



कवि - नंदकिशोर नवल 
किताब - पथ यहाँ से अलग होता है 
संपादक - राकेश रंजन 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014 

रविवार, 25 जनवरी 2015

आटे-दाल का भाव (Aate-daal ka bhaav by Nazeer Akabarabadi)


आटे के वास्ते हैं हविस मुल्क-ओ-माल की 
आटा जो पालकी है तो है दाल नाल की 
आटे ही दाल से है दुरुस्ती ये हाल की 
इसे ही सबकी ख़ूबी जो है हाल क़ाल की 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की 

इस आटे-दाल ही का जो आलम में है ज़हूर 
इससे ही मुँहप नूर है और पेट में सरूर 
इससे ही आके चढ़ता है चेहरे पे सबके नूर 
शाह-ओ-गदा अमीर इसी के हैं सब मजूर 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की 

क़ुमरी ने क्या हुआ जो कहा "हक़्क़े-सर्रहू"
और फ़ाख़्ता भी बैठके कहती है "क़हक़हू"
वो खेल खेलो जिससे हो तुम जग में सुर्ख़रू 
सुनते हो ए अज़ीज़ो इसी से है आबरू 
सब छोड़ो बात तूति-ओ-पिदड़ी व लाल की 
यारो कुछ अपनी फ़िक्र करो आटे-दाल की … 



शायर - नज़ीर अकबराबादी 
संकलन - नज़ीर की बानी 
संपादक - फ़िराक़ गोरखपुरी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1999


गुरुवार, 15 जनवरी 2015

अब क्या देखें राह तुम्हारी (Ab ky dekhein raah tumhari by Faiz Ahmad Faiz)

अब  क्या देखें राह तुम्हारी 
बीत चली है रात 
छोड़ो 
छोड़ो ग़म की बात 
थम गये आँसू 
थक गईं अँखियाँ 
गुज़र गई बरसात 
बीत चली है रात 

छोड़ो 
छोड़ो ग़म की बात 
कब से आस लगी दर्शन की 
कोई न जाने बात 
बीत चली है रात 
छोड़ो ग़म की बात 

तुम आओ तो मन में उतरे 
फूलों की बारात 
बीत चली है रात 
अब  क्या देखें राह तुम्हारी 
बीत चली है रात 


शायर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
संकलन - प्रतिनिधि कविताएँ : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
प्रकाशन - राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पहला संस्करण - 1984