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रविवार, 22 मार्च 2015

दिनान्त पर आलू (Dinant par aaloo by Gyanendrapati)


सुबह सब्जी-मण्डी से गुजरते हुए 
बाजार में नए-नए आए 
ललछौंह आलुओं को देखा था 
सट्टी से सड़क तक उमड़े पड़ रहे थे 
नए-नए आए ललछौंह आलू 
घर-घर तक फ़ैल जाने को अधीर 
डलियों की चौड़ी अंजलियों में भरे लबालब 
पेटू झोलों के दन्तहीन मुँह में झाँकते उत्सुक 

दिन बिताकर 
उधर से लौटते हुए 
सँवलाए हुए दिखते हैं बचे हुए आलू 
उठ जाने से पहले उठे जाते हुए पैठ के साथ 
दिखते हैं मटैले धुमैले 
दिन-भर में ही जाने कितनी दुनिया देखे 
बाजार के रंग-ढंग 

ममतालु किसान-हाथों की मेहनती मजूर उँगलियों से 
ज़मीन की रात से उखाड़कर लाए हुए वे 
दिखते हैं 
रात की ज़मीन को छूते हुए 
थकी निदासी देह की कनपटी से 
और मैं देखता हूँ. आलुओं की देह के 
कार्बोहाइड्रेट में कहाँ से घुलती-मिलती है करुणा 
करुणा - जिसे छिलके के साथ छुड़ाकर 
शेष कार्बोहाइड्रेट को कतर-कतर 
चिप्स में बदलती हैं पैकेटबन्द खाद्यनिर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ 
उन्हें भरतीं पारदर्शी प्लास्टिक-कारागार में 
लाभ-लोभ के सर्वग्रासी जबड़ों के बीच लपलपाती जीभ को सौंपने 



कवि - ज्ञानेन्द्रपति
संकलन - संशयात्मा
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004

शनिवार, 21 मार्च 2015

केवल यही (Kewal yahi by Eliseo Diego)


कविता कुछ नहीं है 
सिवा एक प्राचीन स्टोव की चढ़ती 
परछाईं में बातचीत के 
जब सब चले गए हों,
और दरवाज़े के बहार 
अभेद्य वन सरसरा रहे हों। 

कविता केवल कुछ भ्रम है 
जिनसे किसी को प्यार हो,
और जिनका क्रम समय ने बदल दिया हो,
जिनमें कि अब 
केवल एक संकेत,
एक अनभिव्यक्त आशा,
बास करती हो। 

कविता और कुछ नहीं है 
सिवा आनंद के, परछाइयों में 
बातचीत के,
जबकि और सब कुछ विदा ले चुका हो 
और केवल खामोशी हो। 



क्यूबाई कवि - एलिसेओ दिएगो (2.7.1920 - 1.3.1994)
अनुवाद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
संकलन - धूप की लपेट 
संकलन-संपादन - वीरेंद्र जैन 
प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2000 

बुधवार, 18 मार्च 2015

श्वेत वस्त्र (Shwet vastra by Arutprakasa Vallalar Chidambaram Ramalingam)

आज कपड़ों और रंगों की बात हो रही थी कि तमिल पुनर्जागरण के अग्रदूत रामलिंग स्वामी के कथन पर नज़र पड़ गई. उन्होंने अपने एक प्रवचन में कहा है -

गेरुए वस्त्र युयुत्सा के द्योतक हैं -
युयुत्सा उस व्यक्ति की, जो लड़ता है,
अपनी ही प्रकृति से,
जिसने पराजय कर लिया है प्रकृति को,
प्राप्त किया है करुणा को,
श्वेत वस्त्र उचित हैं उसके लिए। 

अपने श्वेत वस्त्रों के बारे में रामलिंग स्वामी एक पद्य में कहते हैं -

झूलते हुए हाथों से शरमाकर 
मैं हाथ जोड़े चलता रहा 
नग्न होने की अनिच्छा से,
ढंक लिया अपने शरीर और सिर को,
सफेद वस्त्र में,
मैंने देखा नहीं उस ओर
जहां चालाकी टहलती हो,
मैं दुखी हो जाता,
वरना। 

अन्यत्र उनका कहना है -

मैं दुखी हुआ,
जब मित्रों ने सुनहले किनारे की
धोती, मुझे पहनायी,
कितना व्याकुल हो गया था मैं 
हे प्रभो !
फिर वह घबराहट,
जब उन्होंने भरी धूप में,
छतरी तान दी, मेरे सिर पर,
कांप गया मैं !
मैंने हाथों का रूमाल 
खोंस लिया था कमर में,
ताकि हाथ जुड़े रहे,
तेरी प्रार्थना करते रहे। 

आगे वे कहते हैं -

ऊँचे आसन मुझे 
अव्यवस्थित करते हैं,
पैरों के ऊपर पैर 
मुझे अभिनय-सा प्रतीत होता है,
नहीं सो सकता मैं 
नरम गद्दों पर,
मंच पर बैठकर मैं 
नहीं लटका सकता अपने पांव ;
ऊंची आवाजें 
भयभीत करती हैं मुझे,
हे मां, मुझे इन सबसे बचाओ !


कवि - रामलिंग स्वामी (1823 - 1874)
किताब - रामलिंग : कवि एवं पैगम्बर 
लेखक - पुरसु बालकृष्णन
अनुवाद - सुमति अय्यर 
प्रकाशक - नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 1991

रविवार, 15 मार्च 2015

कमइया हमार चाट जाता (Kamaiya hamaar chaat jata by Mahendra Shastri)

कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जेकरा आगे जोंको फीका 
अइसन ई कसइया 
दूहल जाता खूनो जेकर 
अइसन हमनी गइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

अंडा-बच्चा साथे हमरा 
दिन-दिन भर खटइया 
तेहू पर ना पेट भरे 
चूस लेता चँइया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

एकरा बाटे गद्दा-गद्दी 
हमनी का चटइया
एकरा बाटे कोठा-कोठी 
हमनी का मड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 

जाड़ा में बा ऊनी एकरा 
खाए के मलइया 
हमनीं का त रातो भर 
खेलाइलें जड़इया -
कमइया हमार चाट जाता 
इहे बाबू-भइया 



भोजपुरी कवि - महेन्द्र शास्त्री 
संकलन - हिन्दी की जनपदीय कविता 
संपादक - विद्यानिवास मिश्र 
प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002

शनिवार, 14 मार्च 2015

केवल मेरा दुख (Kewal mera dukh by Sanjay Shandilya)


सबका दुख है 
मेरा दुख
बहुत घनेरा दुख

मेरा दुख तो 
मेरा दुख
केवल मेरा दुख l


कवि - संजय शांडिल्य 
संकलन - उदय-वेला 
प्रकाशक - प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, 2014 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है (Khalish bhi aaj to kuchh kam hai by Gulam Rabbani Taban)

ख़लिश भी आज तो कुछ कम है दर्द भी कम है 
चराग़ तेज़ करो हाय रौशनी कम है 

उदास उदास है महफ़िल तही हैं पैमाने 
शराब कम है अज़ीज़ो कि तश्नगी कम है 

हमारे साथ चलें आज कू-ए-क़ातिल तक 
वो बुलहवस जो समझते हैं ज़िंदगी कम है 

अभी तो दोश तक आई है ज़ुल्फ़े-आवारा 
अभी जहाने-तमन्ना में बरहमी कम है 

चराग़े-गुल न जले कोई आशियां ही जले 
जुनूं की राहगुज़ारों में रौशनी कम है 

बस और क्या कहें अहबाबे-तंज़-फ़र्मा को 
शऊर कम है, नज़र कम है, आगही कम है 

रहे है मह्व, सनम को ख़ुदा बनाए हुए 
सुना है इन दिनों 'ताबां' की गुमरही कम है 



ख़लिश = कसक 
तही = ख़ाली 
तश्नगी = प्यास 
 कू-ए-क़ातिल = क़ातिल (प्रिय) के कूचे तक 
बुलहवस = विलासी 
दोश = कंधे 
जहाने-तमन्ना = अभिलाषाओं का संसार 
बरहमी = आक्रोश, उन्माद 
अहबाबे-तंज़-फ़र्मा = कटाक्ष करनेवालों को 
शऊर = चेतना 
आगही = ज्ञान 
मह्व = डूबा रहता है, तन्मय 
सनम = बुत 


शायर - ग़ुलाम रब्बानी ताबां 
संकलन = जिधर से गुज़रा हूँ 
संपादक = दुर्गा प्रसाद गुप्त 
प्रकाशक = शिल्पायन, दिल्ली, 2014 

मेरे कॉलेज के दिनों की किसी कॉपी में लिखी यह रचना आज दशकों बाद ताबां साहब के नए संकलन में मिली है. उन दिनों भी मुझे ताबां साहब पसंद थे और आज भी पसंद हैं. 

सोमवार, 9 मार्च 2015

जी देखा है, मर देखा है (Jee dekha hai, mar dekha hai by Habeeb 'Jalib')

जी देखा है, मर देखा है
हमने सब कुछ कर देखा है

बर्गे-आवारा की सूरत 
रेंज-ख़ुश्को-तर देखा है

ठंडी आहें भरनेवालों 
ठंडी आहें भर देखा है

तिरी ज़ुल्फ़ों का अफ़साना 
रात के होंटों पर देखा है

अपने दीवानों का आलम 
तुमने कब आकर देखा है !

अंजुम की ख़ामोश फ़िज़ा में 
मैंने तुम्हें अकसर देखा है

हमने बस्ती में 'जालिब'
झूठ का ऊँचा सर देखा है। 



शायर - हबीब 'जालिब'
संकलन - प्रतिनिधि शायरी : हबीब 'जालिब'
संपादक - नरेश नदीम 
प्रकाशक - समझदार पेपरबैक्स, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2010