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गुरुवार, 12 मई 2016

उलझन (Uljhan by Purwa Bharadwaj)

एक शब्द है उलझन। इसे घिसा-पिटा न कहें तो पुराना ज़रूर कह सकते हैं। जब शादी होकर आई थी मैं तो इस शब्द के एक नए इस्तेमाल से परिचित हुई। मेरी सास अक्सर इसका इस्तेमाल ऐसे करती थीं जो नकारात्मक और निर्णयात्मक कतई नहीं लगता था, मगर मनःस्थिति को एकदम ठीक ठीक बता देता था। शारीरिक स्थिति को भी, खासकर जब वे कहती थीं कि पैरों में उलझन महसूस हो रही है। मैंने इसके जेंडर आयाम पर निगाह दौड़ाई। अपूर्व भी जिस तरह इस शब्द का इस्तेमाल करते थे, उससे यह साफ़ था मेरे लिए कि उलझन केवल औरतों के पल्ले नहीं है। 

इन दिनों अपने को अक्सर उलझा हुआ पाती हूँ। लगता है कि दिमाग की चाल सुस्त हो गई है। साधारण से काम में भी ज़ोर लगाना पड़ रहा है। दोस्त कहते हैं कि तनाव है, दबाव है, जबकि उसकी कोई ठोस वजह ही नहीं है। उम्र का असर कहकर छूट लेने की उम्र में नहीं हूँ और न ही किसी गंभीर बीमारी की आड़ ले सकती हूँ। फिर यह उलझन सी क्यों है ? लंबे समय तक रहनेवाली उलझन नशा बन जाती है, क्या उसका डर लग रहा है मुझे ?

"उलझन सुलझे ना !" गाना मुझे याद आ रहा है। उसकी अगली पंक्ति है "रस्ता सूझे ना", लेकिन मुझे यह नहीं महसूस होता है। इस उलझन में अकबकाना है, बेचैनी है, फिर भी न भटकन है और न दरवाज़े बंद होने का अहसास है। सोचती हूँ कि अनिवार्यतः उलझन के साथ सुलझन क्यों आता है ? उलझन का विपरीतार्थक भर नहीं है सुलझन, बल्कि उसका उपाय है, उससे निज़ात पाना है. मतलब उलझन ऐसी स्थिति है कि उसके चंगुल से जल्दी से जल्दी निकलना ज़रूरी है !

नहीं, ज़रूरी नहीं है। बहुतों को उलझन रास भी आती है। उनमें किसकी तादाद अधिक है, इसका बाजाप्ता आँकड़ा नहीं मिलता है, लेकिन अमूमन औरतों पर तोहमत लगती है। औरतों को भी यह ताना सुनने की आदत हो जाती है कि तुम उलझन मोल लेती हो। वहाँ उलझन आफत का पर्यायवाची हो जाता है। यहाँ तक कि यह तर्क खीचकर औरत को ही उलझन की प्रतिमूर्ति साबित कर देता है। 

मेरे हिसाब से मानसिक स्वास्थ्य का मसला बन सकती है उलझन, परंतु उसमें निःशेष नहीं होती है। यह सृजन का उत्स भी हो सकती है या उसकी पूर्व अवस्था। मैं अपनी उलझन को इसी तरह देखने की कोशिश कर रही हूँ। इसे अव्यवस्था नहीं कहना चाहती हूँ। यह नियंत्रण छूटना नहीं है। ठहराव से भिन्न है। 

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