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रविवार, 2 जुलाई 2017

पहचानना (Pehchanana by Purwa Bharadwaj)

कितना साधारण सा शब्द है पहचानना। बहुप्रयुक्त भी। उठते-बैठते यह हमारी ज़बान से ऐसे निकलता है जैसे अनायास हो जानेवाली क्रिया हो। लेकिन ऐसा है क्या ?

नहीं है। लोग यह जानते हैं कि पहचानना मुश्किल होता है। यह एक ऐसी क्रिया है जिसमें अक्सर लोग विफल होते हैं, जिसके लिए उन्हें लगभग पूरा जीवन खपा देना पड़ता है। यह आता है अभ्यास से या कहना चाहिए विफलता से सबक सीखने के बाद। यहाँ मुझे मीडिया में लंबे समय से काम कर रहे अपने एक दोस्त राकेश शुक्ला की बात याद आ गई। मेरे दोस्त ने बड़ी अच्छी बात कही थी कि अच्छा निर्णय आता है अनुभव से और अनुभव आता है बुरे निर्णय लेने के कारण हासिल विफलता से। जो लोग यह दावा करते हैं कि वे किसी भी चीज़, स्थिति, इरादे, खतरे, धोखे या किसी भी इन्सान को फ़ौरन पहचानने की क्षमता रखते हैं तो उनको दूर से ही प्रणाम कर लेना चाहिए। यदि अत्यधिक अनुभव हो उनको तो इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वे पहचानने की क्रिया के कई पायदान चढ़ चुके हैं, जिसे मंज़िल कहते हैं उसके काफी निकट पहुँच चुके हैं। लेकिन वे किसी को भी पूरा पहचानने का दंभ नहीं कर सकते। अनुभव पहचानने की राह पकड़ा दे सकता है, लेकिन वह 100 % सफलता पाने का नुस्खा नहीं है।

इसकी पूरी प्रक्रिया होती है। यह सहज बुद्धि से हो जाए वो संयोग की बात है। पहचानने में जानना, बतलाना, अलग करना, दूसरे से अंतर बताना, खूबी और खराबी का विश्लेषण करना, जाँचना, तौलना और समझना सब शामिल हैं। इसलिए यह चरणबद्ध है, क्रमबद्ध है और इसकी खूबी कहिए या खराबी, कब कौन सा चरण आएगा यह तय नहीं रहता है।

मैंने इसे एकदम अलग संदर्भ में समझा है। इस साल विज्ञान और जीवन के अलग अलग पहलू को जोड़कर छोटी किताबों की एक शृंखला का संपादन किया था मैंने। लेखन था मेरी ननद अनुपमा झा का जो वनस्पति विज्ञान में दक्ष हैं। उसमें एक था पुष्पक्रम (Inflorescence) यानी फूलों की सजावट। मैं ठहरी संस्कृत वाली। मेरे लिए शब्द के तौर पर यह अपरिचित न था, मगर इसका जो अर्थ है न केवल वह नया था, बल्कि विषय ही नया था। फूल-पत्तों से मेरी दोस्ती नहीं थी, कोई जान-पहचान नहीं थी सिवा इसके कि गुलाब, बेला, उड़हुल, चंपा, गेंदा वगैरह के बारे में सामान्य तौर पर पता था। फूलों की किस्म, उनके रंग-रूप, खुशबू को तो मैं समझती थी, लेकिन इससे अनभिज्ञ थी कि फूलों के परिवार उनकी सज्जा के आधार पर भी बने हुए हैं।

भला आप ही बताइए कि कौन सा फूल गुच्छे में है, कौन एकाकी रहता है, किसे उल्टा लटकना पसंद है या किसे छुपकर बैठना, यह हमें क्या मालूम ! मिलता-जुलता फूल देखकर उनके भाई-भतीजे या अम्मां-बाबा होने का तनिक अंदाजा तो लगाया जा सकता है, मगर सरसों और पलाश (टेसू) और फूलगोभी में भी कोई रिश्ता हो सकता है, यह मुझ जैसों की कल्पना से परे था। जब मुझे मालूम हुआ कि गेंदा का फूल वास्तव में कई फूलों का अड्डा है तो मैं दंग रह गई। उसकी एक एक पत्ती जो हमें दिखती है वह एक एक फूल है - यह जानना रहस्य से पर्दा उठना था। जानते जानते यह भी पता चला कि फूल की पंखुड़ी ही नहीं और भी हिस्से हमारा ध्यान खींचते हैं। जैसे बोगनवेलिया में रंगीन जो दिखता है वह पंखुड़ी न होकर ब्रैक्ट है जिसका काम है फूल के अंदरूनी हिस्सों - पुंकेसर आदि की रक्षा करना। फूलों की सजावट को पहचानने की तरफ उठा यह पहला कदम था।

इसके बाद जब कभी मैं सैर को जाती तो मेरा ध्यान फूलों की सज्जा और टहनियों, डंठल वगैरह की तरफ जाने लगा। कौन किधर से मुड़ रहा है, किसकी कितनी शाखाएँ हैं और कहाँ तीन का दल होता है कहाँ पाँच का और कहाँ जोड़े में फूल आते हैं, किस डंठल के सिरे पर फूल आकर उसकी बाढ़ रोक देते हैं - ये सब थोड़ा थोड़ा दिखने लगा। एक बिंदु से यदि तीन डंडियाँ निकलीं तो फिर हरेक से तीन-तीन डंडियाँ ही निकल रही हैं और कोई छातानुमा है या कटोरेनुमा तो हर बिंदु पर उसकी समाप्ति उसी रूप में हो रही है  - प्रकृति की इस व्यवस्था को देखकर व्यवस्थापक के रूप में किसी अदृश्य सत्ता के अस्तित्व को मान लेना बहुत अस्वाभाविक नहीं है। वह भी तब जबकि सबकी विविधता अक्षुण्ण है। मैं अचंभित थी कि मैं वही हूँ, रास्ता वही है, पेड़-पौधे भी वही हैं, लेकिन अब मुझे पैटर्न क्यों नज़र आने लगा है। पहले मेरे लिए पेड़-पौधों व उनके पत्तों के आकार-प्रकार और फूलों की सुंदरता के अलावा पेड़-पौधों में कुछ नहीं था। उनका अस्तित्व केवल हरियाली के लिए था, मगर अब उनमें जीवन के चिह्न टटोलने लगी मैं।

रेसीमोज़, साइमोज़, हाइपैनथोडियम जैसे तकनीकी नाम जो मैंने उन किताबों की लेखिका के मुँह से सुने थे, लेकिन सालों साथ रहकर भी जिनके ज्ञान से मैं लाभान्वित नहीं हो पाई थी, वे नाम मुझे पौधों की शाखाओं पर थोड़ा थोड़ा बोलते हुए सुनाई पड़ने लगे। संपादन के काम ने उस पहचानने की प्रक्रिया को गाढ़ा किया और मैं पुष्पक्रम के बीच के अंतर को समझने के लिए सवाल करने लगी। सवाल मुझे वनस्पति विज्ञान की दुनिया के और अंदर ले जाने लगे। पहचानने के लिए करीब तो जाना ही पड़ता है। वह कुर्बत बुनियाद है पहचानने की, भले भौतिक रूप से हो या आध्यात्मिक रूप से। और दिलचस्प है कि यही कुर्बत पहचानने का हासिल भी है। आखिर किसी को भी पहचानने के बाद हमें उसकी नज़दीकी ही हासिल होती है न ! इसे यों भी कहा जा सकता है कि कुर्बत पाना ही लक्ष्य होता है पहचानने का।

मैं पेड़-पौधों को पहचानने की राह पर आगे बढ़ी। पुष्पक्रम की आरंभिक सीढ़ियाँ उतरना शुरू किया मैंने। एक-एक करके। पहली सीढ़ी पर मैंने जाना कि रेसीमोज़ पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) के भीतर भी भेद हैं। दूसरी सीढ़ी पर दिखा कि कोई  कौरिम्ब (corymb) है तो कोई स्पाइक (spike), कोई कैपिचुलम (capitulum) है तो कोई स्पैडिक्स (spadix), यह पहचानने की सीढ़ियाँ ही तो थीं। सारा खेल इसका है कि उस पुष्पक्रम में main axis फूल में नहीं खत्म होता है और इस वजह से कहीं वह लंबाई में खिंच जाता है, कहीं छोटा हो जाता है तो कहीं चिपटा हो जाता है उसको कायदे से समझने के लिए, अपना संतुलन बनाने के लिए मुझे पहचानने की इन सीढ़ियों पर भी आगे-पीछे करना पड़ा।

आज मैं फूलों को पहचानने लगी हूँ, यह नहीं कह सकती, लेकिन इसने हमारे बीच दोस्ती का बीज ज़रूर रोपा। यही समय था जब श्वेता और अर्पित तीन गमले लेकर मेरे घर आए। तीन मंज़िल चढ़कर। हमारी शादी की सालगिरह के तोहफे के रूप में। उसके पहले घर में गाहे-बगाहे गुलदस्ता आ जाया करता था। एकाध जगह से चीनी मिट्टी के गमले सहित पौधे भी मिले थे जो ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने लगे थे। लेकिन उन तीन गमलों ने मुझे उत्साह दिया कि अपनी छत को सजाऊँ। वहाँ से माली, गमला, मिट्टी, पौधे, बीज, खाद, औज़ार की खोज का सिलसिला शुरू हुआ। मुझे समझ में आया कि पहचानना और खोजना बहुत अलग अलग क्रियाएँ नहीं हैं, उनका आपस में रिश्ता है। 

जब मैं निज़ामुद्दीन दरगाह के पास सुंदर नर्सरी गई तो उस विशाल क्षेत्र में बहुत पेड़-पौधे थे। एक तरफ सजावटी तो दूसरी तरफ फल-सब्ज़ी के। जो चाहो ले लो। मैं ठीक से पहचानती किसी को नहीं थी, इसलिए चुनना मुश्किल था। (चुनाव के समय बैलेट पेपर में चुनाव चिह्नों और उम्मीदवारों  के बीच में से अपने मुताबिक कायदे के उम्मीदवार को चुनना भी इतना ही मुश्किल मालूम होता है न ? क्यों ? इसलिए कि किस उम्मीदवार की नस्ल क्या है, कौन किस खाद-मिट्टी का बना है, किसमें काँटे हैं और कौन कब मुरझा जाएगा, इसको पहचानना आसान नहीं होता है।) शायद चुनने की पूर्ववर्ती क्रिया है पहचानना। ज़रा सोचें कि यदि उल्टा चलें तो क्या होगा ? मतलब पहले चुन लें और तब पहचानना शुरू करें तो नतीजा क्या होगा ? (चुनाव में अक्सर यह होता है जब हम अनजान और नए उम्मीदवार पर ठप्पा लगाते हैं और आगामी सालों में उसकी हरकतों के आधार पर उसे पहचानने लगते हैं।)

पहचानना कितना लंबा सफ़र है, कहना मुश्किल है। यह अंतहीन भी हो सकता है, घुमावदार और ऊबड़-खाबड़ तो हमेशा रहा है। निराशा और आशा के बीच के द्वंद्व से भरा हुआ भी। इंसान हमेशा गीता का उपदेश लेकर इस राह पर नहीं चलता है, इसीलिए खीझता है, जूझता है, लड़ता है। जब अपने जैसे इंसानों को पहचानने का मसला हो तो दोनों तरफ से ताकत झोंक दी जाती है।

यह सवाल मुझे मथ रहा है कि पहचानना क्रिया और पहचान संज्ञा का क्या संबंध है ? इन दिनों चारों तरफ पहचान या अस्मिता की बातें हो रही हैं। पहचान का संघर्ष है, उसके इर्द गिर्द होनेवाली गोलबंदी है और पहचान के आधार पर होनेवाली हिंसा है। आज के अखबार में ही मैंने जुनैद के सबसे अच्छे दोस्त रहे यासिन की बात पढ़ी है – “वो (जुनैद) हम सब के लिए कितना कुछ था, लेकिन अब हर कोई उसे ट्रेन में मर जानेवाले लड़के के रूप में जानता है।“ जुनैद नाम के लड़के को हम जान रहे हैं, क्या यह पहचानना है? उसमें कुर्बत कहाँ है ? क्या उसकी कौम को पहचानने का सफ़र हम तय करना चाहते हैं ?


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