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मंगलवार, 8 अगस्त 2017

हल्कापन (By Purwa Bharadwaj)


हल्कापन क्या बुरी चीज़ है ?

नहीं तो !

यह इस पर निर्भर करता है कि हम किस चीज़ के हल्केपन की बात कर रहे हैं.

हल्कापन भारहीनता का द्योतक है. इस अर्थ में मुझे याद है 'नैषधीयचरितम्' का वह श्लोक जिसमें दमयंती के सौंदर्य की पराकाष्ठा का वर्णन था. उसका भावार्थ था कि विधाता ने जब दमयंती के रूप को तौलना चाहा था तो वह इतना भारी था कि धरती पर आ गया और तुला के दूसरे पलड़े पर बटखरे के रूप में रखे गए तारे इतने हल्के थे कि ऊपर आसमान में टंग गए. यह हल्कापन तो अनमोल है.
हल्का होने का भाव है हल्कापन. हल्का का अर्थ है मात्रा-परिमाण में कम. मैंने इस शब्द का सिरा पकड़ने की कोशिश की तो कहीं मिला कि हल्का या हलका अरबी भाषा का है. फिर प्रामाणिक विद्वानों से लेकर उर्दू शब्दकोशों ने इसे हिन्दी का बताया. मूल धातु का पता नहीं चला. एकाध से चर्चा की. यह कौंधा कि कहीं यह अल्प यानी कम से बना-बिगड़ा रूप तो नहीं. जो हो बहुत जगह हल्कापन काम्य है.

देह हल्की हो तो पी टी उषा को मात दे सकती हैं आप. सर हल्का हो तो क्या बात ! मन हल्का हो तो आसमान में उड़ने के लिए पर नहीं चाहिए. जी हल्का हो तो आप शहंशाह से कम नहीं. हल्की मुस्कान जैसा मारक तो कोई नहीं. कोई हल्का स्पर्श जीवन की दिशा बदल देने में सक्षम है. किसी की हल्की आहट पूरा शरीर रोमांचित कर दे सकती है. 

और हवा के हल्के झोंके का तो क्या कहना ! यह हल्कापन गति को बताता है. मंद मंद पवन पर कवि-गीतकार फ़िदा रहते हैं. चाँद के फाँक की हल्की झलक जश्न मनाने के लिए काफी है. हल्का-झीना पर्दा चुंबक की तरह खींच सकता है तो रोक भी सकता है. तिनके की ओट से हल्की ओट क्या होगी भला ! 

हल्का सुरूर, हल्का नशा जान न लेने देता है और न जान देने देता है. वैसे ही हल्का दर्द. तभी यह मीठा-मीठा दर्द कहलाता है. हल्की खुमारी की बात करें तो इसकी भला चाहत किसे नहीं !

अब ठोस चीज़ों को ज़रा देखें. कानों के ज़ेवर की बात लें तो वह जैसा भी हो हल्का होना उसकी ख़ासियत में शुमार है. इस सिलसिले में एक लेख बार-बार याद आता है - 'फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान'. इसे लिखा था 1911 में आलिया बेगम बिन्त मुजीब अहमद तमन्नाई ने. [पिछले दिनों रसचक्र की हमारी टीम द्वारा जिन कुछ गैर-कथात्मक लेखों का नाटकीय पाठ किया गयाउनमें 'फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कानलेख शामिल था. हमारी प्रस्तुति का नाम था 'हम ख़वातीनऔर इस लेख का पाठ किया था रिज़वाना फ़ातिमा ने ]

आलिया बेगम का कहना था कि कान तमाम जिस्म में सबसे छोटे होते हैं. इस सूरत में उनमें हद से ज़्यादा ज़ेवर लादना नन्हीं सी जान पर सख्त ज़ुल्म करना है. लेखिका के हिसाब से कानों की बिसात के माफ़िक ज़ेवर पहनना चाहिए. भारी ज़ेवर बनाम सुबुक ज़ेवर की यह बहस दिलचस्प थी. इसमें जहालत दूर करके सुधार की निगाह से श्रृंगार के नए पैमाने गढ़ने की बात है जो 19-20 वीं सदी में किया जा रहा था. 

अंग्रेज़ी तालीम का असर कहिए या फूहड़पन की जगह Sophistication कहिए, हल्के ज़ेवर लंबे समय से खासे पसंद किए जाते हैं. गले, नाक-कान, सबमें. मगर यह क्या पूरी तरह सच है? जी नहीं. यह सार्वभौम सत्य नहीं है. हर जगह इसको काटनेवाले उदाहरण मिल जाते हैं.

1990 की बात है. मेरी करीबी रिश्तेदार का वाकया है. वे दुल्हन बनकर घूँघट में बैठी थीं. मोहल्ले की उच्चवर्ण की औरतें घूँघट के भीतर हाथ डालकर दुल्हन के गले को टटोल रही थीं. गले का हार कैसा है, कहीं हल्का तो नहीं है, इससे वे लड़कीवालों की हैसियत को तौल रही थीं. विज्ञान में निष्णात नववधू अवाक् थी. वही नहीं, न जाने कितनी ऐसी लड़कियाँ होंगी जिन्होंने मायके से कम और हल्के गहने लाने के कारण मानसिक के साथ शारीरिक प्रताड़ना झेली होगी. सिर्फ कभी कभार नहीं, बल्कि बहुत बार वह 'हल्कापन' ससुराल में बहुओं को आजीवन हल्का बना देने का बहाना बन जाता है. वैसे हिन्दू घरों की शादियों में मंडप पर लड़केवाले जब हल्के गहने चढ़ाते हैं तो वहाँ भी ज़ोर आजमाइश होती है और गालियों से ससुर-भैंसुर को नवाजा जाता है. बड़े घर-छोटे घर, बड़ी जाति-छोटी जाति, धर्मी-कुधर्मी वगैरह की टकराहट से उपजनेवाले लफड़े को छोड़ दें तो लड़का प्रताड़ना का शिकार शायद ही बनता है. 

[ज़ेवर और ज़ेवर प्रेम को देखें तो यह अपने आप में पूरा सामाजिक ताना-बाना समेटे हुए है. प्रेमचंद के उपन्यास गबन की नायिका जालपा का पूरा चरित्र चित्रण इसी के इर्द गिर्द घूमता है. हम इसका आज जेंडर निर्मिति - Gender Construction की दृष्टि से विश्लेषण करने लगे हैं, लेकिन उसके बाकी आयामों को पूरी तरह नहीं देख पाते हैं.] 

बहरहाल, लौटते हैं हल्केपन पर. मेरी दिलचस्पी बाकी ज़ेवर में नहीं है, मगर कानों के हल्के बुंदे मुझे पसंद हैं. मैं खोजकर हल्के बुंदे खरीदती हूँ ताकि कान बदनुमा मालूम न हों. वज़नदार बुंदे पहन लो तो कान में दर्द होने लगता है. लगता है कि वज़न के मारे कान टूट जाएँगे. यहाँ हल्कापन नफ़ासत और नज़ाकत को साथ लेकर चलना है, केवल वज़न कम होना नहीं है. 

एक आग्रह मेरा और है. लेखिका के नाम पर ध्यान दीजिए - आलिया बेगम बिन्त मुजीब अहमद तमन्नाई यानी D/O मुजीब अहमद तमन्नाई, मुजीब अहमद तमन्नाई की बेटी. यह औरतों का परिचय देने का सदियों पुराना तरीका है. पुरानी उर्दू में यह लिखित रूप में कसरत से पाया जाता है. साहित्य और भाषा के दायरे से आगे बढ़कर यह तरीका जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी पाया जाता है. औरतों को अक्सर उनके पिता, भाई, पति, बेटे के नाम से पहचानने का चलन मान्य है. कहना न होगा कि यह संस्कारी तरीका है. ऐसा नहीं है कि इस परंपरा में औरत को कम करके आँका जा रहा है या उसके वजूद को हल्का किया जा रहा है ! यदि यहाँ हल्केपन की बू आपको आ रही है तो इसका मतलब है कि आप नारीवादी राजनीति के दलदल में फँस रहे हैं !

हाज़िरीन, हल्केपन की बात करनी है तो रंगों की दुनिया में जाइए. वहाँ अमूमन हल्का रंग परिष्कार और कुलीनता का द्योतक है. उसकी सीढ़ी चढ़नी है तो गाढ़े रंग से हल्के रंग पर उतर आइए. चटक-मटक रंग गँवई और below standard माना जाता है. ध्यान रहे यह हल्का रंग अपनी प्रकृति में हल्का होना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं कि आप रंग उड़े या फीके पड़ गए रंग को हल्का कहकर चलाइएगा. चालाकी नहीं चलेगी. हल्कापन असली होना चाहिए, नकली नहीं. रँगा सियार का किस्सा याद है न ? उसकी ही नहीं, हल्केपन की भी पोल खुलती है.

मगर ज़रा ठहरिए. यह मैं क्या कह रही हूँ ! असली और नकली का सवाल उठाना तो उचित नहीं. यह शुद्धतावादी नज़रिया है. इसमें फँसने की जगह शायद यह कहना चाहिए कि हल्कापन मौलिक हो तो अधिक पसंद किया जाता है. अलबत्ता मौलिकता की दुहाई विभाजनकारी सिद्धांत है.

गाढ़ा रंग जहाँ चाहिए वहाँ चाहिए. लाल मतलब टहटह लाल, नारंगी मतलब चटक नारंगी. यह प्रतिबद्धता का मसला बन जाता है. यदि आप मुख्यधारा के गाढ़े रंग की पटरी से उतरे और आपका रंग हल्का पड़ने लगा तो खतरा हो सकता है. सावधान ! टिके रहिए. यह विचलन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इस जगह हल्के से गाढ़े की तरफ जाना तरक्की और समझदारी कहलाएगी, मगर गाढ़े से हल्के की तरफ बढ़ना गद्दारी होगी. विवेक ऐसा करने से रोकता है.

हल्कापन चरित्र का हो तो गंभीर मामला कहलाता है. खासकर औरतों के संदर्भ में. सारा कल-काँटा उनका दुरुस्त होना चाहिए. उनमें किसी तरह का हल्कापन लोगों को असंतुलित कर देता है. यह अलग बात है कि लोगों को औरत की हँसी हल्की चाहिए (ठहाका नहीं), आवाज़ हल्की चाहिए (रोबदार और सवालिया नहीं), चाल हल्की, नपी-तुली चाहिए (झटकेदार और बेफिक्र नहीं), नज़र हल्की चाहिए (आक्रोश और स्वाभिमान भरी नहीं), कद-काठी हल्की चाहिए (लंबी-तगड़ी नहीं), भौं की कमान भी हल्की चाहिए (चढ़ी हुई नहीं)...

मतलब हल्कापन किसका क्या और कितना है, यह प्रतिष्ठा के तराजू पर तौला जाता है. हाँ, इसमें कभी किसी पलड़े पर नेता-राजनेता, ट्रंप-वंप का व्यवहार नहीं रखा जाएगा. उन सबके संदर्भ में हल्केपन की बात करना बेमानी है. फिलहाल चारों तरफ विमर्श का स्तर कुछ और है, भाषा का स्तर कुछ और है ! 

इंतज़ार कीजिए माकूल वक्त का ताकि हल्केपन की बात करना खतरनाक न बन जाए.


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